
लोक निर्माण विभाग के कारनामें ऐसे कि मात्र एक साल के अंदर ही धंस गई सड़क धंस गया पुल, किसने किया भ्रष्टाचार, किस किस से हुई भूल? इस पूरे भ्रष्टाचार के खेल में संलिप्त आखिर कौन कौन?
सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र देबाशीष गांगुली एमसीबी मात्र कुछ माह पुर्व बन कर तैयार हुए पुल की हालत इस कदर हो गई हो मानो जैसे चुनाव में बिना किसी तैयारी के लड़ने के इच्छुक एन तेन पार्टी से चुनाव के ज़मीनी जंग में उतरा हुआ ऐसा प्रत्याशी जो कि इस कदर हारा हुआ हो कि जिसकी जमानत तक जब्त हो गई हो और जिसका अब आगे कोई माई बाप नहीं, ना इधर का रहा ना उधर का, ऐसा हाल वर्तमान में लोक निर्माण विभाग अंतर्गत खड़गवां ब्लॉक के ग्राम पंचायत पोंड़ीडीह से ग्राम पंचायत तामडांड़ मार्ग पर कोडांगी नाला पर उच्चस्तरीय पुल एवं पहुंच मार्ग बनाया गया, जहां शासन के पैसों का दुरूपयोग सम्पूर्ण रूप से देखा जा सकता है जहां पुल की लंबाई सूचना पटल में 80 मीटर दर्शाई गई है, और पहुंच मार्ग की लंबाई करीब 621.00 मीटर दर्शाई गई है। इस सम्पूर्ण निर्माण कार्य की कुल लागत 356 लाख के करीब बताई गई है, और कुछ माह पुर्व, मतलब 9-10 माह पुर्व इस पुल के निर्माण कार्य को पूरा किया गया, जहां पूरे एक साल भी नहीं बीते और इस निर्माण कार्य की सच्चाई सबके सामने नज़र भी आने लगी, सबकी पोल खुलने लगी, जब इस निर्माण कार्य में की गई अनियमितताएं उभर कर आने लगीं, पुल के शुरूआती हिस्से में पुल धंसते नज़र आई है, और सड़क भी धंसते नज़र आई है, इतने निम्न स्तर के निर्माण कार्य को अंजाम दिया गया है मानो लोक निर्माण विभाग को कोई फर्क ही नहीं पड़ता कि लोगों के हित के लिए उस पुल का इस्तेमाल हो चाहे ना हो, जहां करीबन कई फीट तक पुल से जुड़ी सड़क ज़मीन में धंसती चली है, इस निर्माण कार्य में दरारें तो जैसे कोई आम बात हो?
कई ऐसे विशेष सुत्र बताते हैं कि क्षेत्र में चल रहे पी डब्लू डी विभाग के किसी भी निर्माण कार्य से संबंधित जानकारी लेने लोक निर्माण विभाग के उच्च पद पर पदस्थ गैरज़िम्मेदार जवाबदेही कर्मियों से जब जब बात करने का प्रयास किया जाता है, अधिकारी सदैव बात को घुमाते टाल मटोल करते नज़र आते हैं, अपनी फंसीं पेंच बचाते नज़र आते हैं।
असंतुष्ट होने के बाद जब जिले के लोक निर्माण विभाग के उच्च पदाधिकारी के कार्यालय मनेंद्रगढ़ में उनसे मुलाकात की अपेक्षा लिए कई लोग वहां पहुंचे, जिस पर सुत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, महोदय इस क़दर चिंताजनक स्थिति अपने कार्यों में अस्त व्यस्त थे कि बातों ही बातों में पूरी बात बिना समझे और सुने ही, उन्होंने सीधे सीधे यह कह दिया कि विधानसभा मनेंद्रगढ़ क्षेत्र में छत्तीसगढ़ प्रदेश के मुखिया मुख्यमंत्री भुपेश बघेल के दौरे की बात चल रही है, (हालांकि, मुख्यमंत्री का दौरा फिलहाल स्थगित करते हुए उसे आगे अगामी दिनांक तक बढ़ा दिया गया है), और वे इस क़दर उनके स्वागत समारोह में विलीन हो चुके हैं कि वो किसी भी बात का जवाब देने में फिलहाल असमर्थ हैं, उनकी बातों से कहीं ना कहीं ऐसा प्रतीत हुआ कि इसके आगे उन्हें कोई अन्य काम अब इतना महत्वपूर्ण नज़र ही नहीं आता, जनसेवा से भी बढ़ कर और भी कुछ ज़िम्मेदारी है उन पर, जो वो कहते कहते ना कह पाए, या शायद ना कहते हुए, उन्होंने कहा ही दिया।
मगर हर बार की तरह इस बार भी उनके द्वारा मात्र एक आश्वासन पर बात को खत्म करने की कोशिश की गई कि मुख्यमंत्री के कार्यक्रम के बाद ही उनके द्वारा इस मामले को संज्ञान में लेते हुए इस पर विचार किया जाएगा, जिस पर लोक निर्माण विभाग की बड़ी लापरवाही स्पष्ट रूप से सामने देखने को मिली, ना सिर्फ कोडांगी मगर जिले भर में पी डब्लू डी विभाग द्वारा किए गए ऐसे कई निर्माण कार्य जिसमें विभाग द्वारा जम कर भ्रष्टाचार किया गया है, जिसकी सूद लेने वाला कोई नहीं, सवाल उठता है, ऐसा क्यों? तो जवाब जनता ही देती है कि कहीं ना कहीं भ्रष्टाचार के इस बड़े मायाजाल में संलिप्त हैं सारे के सारे, क्षेत्र के जनता प्रतिनिधियों से ले कर विभाग के उच्च अधिकारी, सबका काम बड़े ही शालीनतापूर्वक मिल बांट कर कमीशनखोरी अंदाज में बस चल रहा है?
हालांकि उनके लिए यह मामला उतना चिंता का विषय इसलिए भी नहीं है क्योंकि ग्राम पंचायत कोडांगी तरफ मुख्यमंत्री का काफिला गुज़रना ही नहीं है, तो उन्हें फर्क पड़े भी तो क्यों?
चुनावी माहौल फिलहाल गरमाया हुआ है मगर इस चुनावी मौसम में बोली भाली जनता के एवं शासन के पैसों का बंदरबांट कर विभिन्न विभागों के उच्च पदाधिकारी कहीं ना कहीं यह भी दर्शाने का प्रयास कर रहे हैं कि प्रदेश के मुखिया की जी हुजूरी अगर भलि भांति की जाए, तो जांच पड़ताल से भी बचा जा सकता है और तो और मन मौजी ढंग से निर्माण कार्यों को अंजाम देते हुए मोटा कमीशन नीचे से उपर तक हेर फेर करके अपनी कुर्सी भी बचाई जा सकती है, ना टेस्ट रिपोर्ट का झंझट ना ही उच्च स्तर के निर्माण कार्यों की कोई ज़िम्मेदारी, मगर ऐसी कार्यप्रणाली किस हद तक सही है? क्या इसे उच्च अधिकारियों पर राजनीतिक दबाव कहा जाए या फिर राजनीतिक दलों द्वारा ऐसे लापरवाह अधिकारियों को संरक्षण?
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