
आखिर 2 ही न्यूजपेपर पर छपे खबर से ही क्यों थी परेशानी,सबने साहब की खबर उछाली क्या हमारा इतना भी हक नहीं था..?
सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर जिले के बहुचर्चित तहसीलदार संजय राठौर के काले कारनामों की शिकायत जब जोर पकड़ने लगी तब पत्रकारों ने इस मामले पर अपने अपने स्तर पर पीड़िता को न्याय दिलाने के लिए अपना अपना प्रयास प्रारंभ कर दिया तो कुछ चाटुकार तहसीलदार से विज्ञापन लेकर मामले को एकतरफा बताने का प्रयास करते हुए केवल वीरेंद्र दुबे का बयान छापने लगे थे,और पीड़िता को फर्जी,लालची और कई अपमानजनक शब्दों से संबोधित करने लगे थे,इसी दौरान जब मामले की जानकारी हमे प्राप्त हुई तो हमने तो हमने पीड़ित पक्ष से उनका बयान देने की बात कही और साक्ष्य जिसके आधार पर उन्होंने यह आरोप लगाए थे फिर तहसीलदार को फोन किया और तहसीलदार संजय राठौर से उनका बयान देने को कहा जिसपर उनके द्वारा हमे कार्यालय बुलाया गया और उनके फोन रखने के महज कुछ मिनटों बाद चप्पू मिश्रा उर्फ प्रभेश मिश्रा फोन कर कहता है कि महाराज आप जो सौतेले पुत्र वाला खबर चलाए हैं उस पर कमलेश दुबे लोग आपके विरुद्ध fir करवाने जा रहे हैं,जब हमने पप्पू मिश्रा को कहा कि नकल के लिए अक्ल की जरूरत होती है मिश्रा जी हमने केवल फोन किया है खबर नहीं चलाया तो वो हक्का बक्का रह गया। हमने सभी पक्षों की बातों को देखते समझते हुए खबर का प्रकाशन किया जिस पर लगभग सभी पहलुओं का समावेश करने का प्रयास किया गया था,लेकिन बाबजूद इसके तहसीलदार को केवल सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र और दो अन्य प्रतिष्ठित अखबार हिंद स्वराष्ट्र समाचारपत्र और एक अन्य समाचारपत्र के खबर से दिक्कत आई,उन्होंने सोचा कि अब इनको नोटिस भेजकर डराया जाए और अपने विरुद्ध चल रहे खबरों पर अंकुश लाया जाए पर उनकी यह रणनीति विफल रही और उनके नोटिस भेजकर हमे डराने से पहले ही शासन ने उन्हें निलंबित कर नोटिस थमा दिया, जिस प्रकार सिंधु स्वाभिमा, हिंद स्वराष्ट्र,एक अन्य ने इस खबर को प्रमुखता से प्रकाशित किया और तहसीलदार संजय राठौर के काले कारनामों को उजागर किया जिसके परिणामस्वरूप तहसीलदार संजय राठौर निलंबित हुआ,इसी कारण वैमनस्यता रखते हुए तहसीलदार के द्वारा हमे डराने का प्रयास किया जा रहा है,उससे यह प्रतीत होता है कि तहसीलदार महोदय स्वयं डरे हुए हैं,और जब कुछ सूझ नहीं रहा है तो ऐसी हरकतें कर रहे हैं।
तहसीलदार की तहसीलदारी पर हमे शक नहीं था लेकिन सबने उनके कारनामों की बैंड बजाई क्या हमारा हक नहीं था
तहसीलदार के क्रियाकलापों पर हमे संदेह नहीं था लेकिन जब इस संपूर्ण मामले पर पीड़ित पक्ष ने साक्ष्य और आधार प्रस्तुत किए उन्हें देखने के बाद यह स्पष्ट हो जाता है कि तहसीलदार के द्वारा किए गए काम कितने घोटाले युक्त रहे।तहसीलदार सब जानते हुए भी अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के लिए वकील का सहारा ले रहे हैं,तहसीलदार साहब शायद अज्ञानतावस पत्रकार और मीडिया संस्थानों से बेवजह उलझ रहे हैं क्योंकि सारे साक्ष्य तहसीलदार और बीरेंद्र दुबे एंड कंपनी के खिलाफ हैं।
वाह वही लेने की लगी होड,पर तहसीलदार के नोटिस ने खोली सबकी पोल बताया किसका न्यूज रहा सबसे असरदार
सिंधु स्वाभिमान,हिंद स्वराष्ट्र, एक अन्य के खबर से बौखलाए तहसीलदार ने अपने नोटिस में केवल 2 ही न्यूज़ पेपर का जिक्र किया और उन्हें परेशानी केवल तीनों समाचारपत्रों से ही था,उनका नोटिस इस बात को प्रमाणित कर रहा है कि उनके किए गए कारनामों पर सटीकता से खबर लगने वाले केवल सिंधु स्वाभिमान हिंद स्वराष्ट्र ही हैं।बाकी जो भी अपने अपने दावे कर रहे हैं उनकी जुबानी केवल एक कहानी ही है,तहसीलदार के कारनामों में सटीकता का तीर हमने चलाया है यह बात तहसीलदार भी मान रहे हैं इस लिए उन्होंने हमे नोटिस भेजा और अन्य किसी को नहीं। तहसीलदार की जानकारी भी अधूरी हैं क्योंकि तहसीलदार जिसे अपने नोटिस में पोर्टल बोल रहे हैं वो पोर्टल नहीं बल्कि न्यूजपेपर हैं इस बात का उन्हें ज्ञान नहीं है।
कार्यवाही की प्रक्रिया अभी अधूरी क्या जांच में दोषी तो क्या अब अपराध भी दर्ज होगा तहसीलदार और वीरेंद्र दुबे और उनके सहयोगियों पर
तहसीलदार संजय राठौर जांच में दोषी पाए हैं तो उन्हें केवल सस्पेंड मात्र ही क्यों किया गया है उनके इस कृत्य पर अपराध पंजीबद्ध करा कर के उनके खिलाफ विधिवत कार्यवाही क्यों नहीं की जा रही है यह भी सोचने का विषय है।
संजय राठौर निलंबित तो फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनाने वाले वीरेंद्र दुबे पर कब होगी कार्यवाही…?
संजय राठौर को निलंबित किया गया हैं क्योंकि वो जांच में दोषी पाए गए थे लेकिन जिस मामले में संजय राठौर दोषी पाए गए हैं उस मामले पर कूट रचित दस्तावेज बनवाने वाले वीरेंद्र दुबे पर आज तक कोई कार्यवाही नहीं की गई है यही भी समझ से परे हैं क्योंकि कूटरचित दस्तावेज के जरिए ही इतनी बड़ी समस्या उत्पन्न हुई है,आज तहसीलदार संजय राठौर भी एक बार यह जरूर सोच रहे होंगे कि ना वो वीरेंद्र दुबे के फर्जी दस्तावेज को देख कर प्रलोभन में आते ना ही आज निलंबित होते। खैर दोषी जितना तहसीलदार संजय राठौर हैं उनता ही वीरेंद्र दुबे और कमलेश दुबे भी हैं,आगे देखने का विषय है कि इस मामले में क्या कार्यवाही प्रशासन द्वारा होती है।
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