मैनपाट में अदालती आदेश की धज्जियां: कोर्ट के स्टे के बावजूद विवादित जमीन पर काम जारी, पुलिस की निष्क्रियता पर उठे सवाल

सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र मैनपाट सरगुजा छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के मैनपाट तहसील के अंतर्गत ग्राम अमगांव में अदालत के स्थगन (स्टे) आदेश की खुलेआम धज्जियां उड़ाने का एक गंभीर मामला सामने आया है। प्रार्थी चंद्रबली (आत्मज सुखनंदन) के आवेदन पर तहसीलदार न्यायालय मैनपाट द्वारा जारी स्थगन आदेश (दिनांक 18/06/2026) के बावजूद विवादित भूमि पर अवैध रूप से कार्य कराया जा रहा है। पीड़ित पक्ष का आरोप है कि शिकायत के बाद भी स्थानीय पुलिस प्रशासन मूकदर्शक बना हुआ है।

क्या है पूरा मामला?

संलग्न अदालती दस्तावेज के अनुसार,ग्राम अमगांव स्थित भूमि खसरा नंबर 63/2/ख, 63/2/घ, और 63/94/क (कुल रकबा क्रमशः 2.0230, 2.8320, 1.4370 हेक्टेयर) पर बंटवारे का मामला न्यायालय में विचाराधीन है। इस पर सुनवाई करते हुए तहसीलदार मैनपाट ने अनावेदक रेवती (आत्मज सुखनंदन) को आगामी आदेश तक किसी भी प्रकार का कार्य तत्काल बंद करने का सख्त आदेश दिया था। आदेश में स्पष्ट चेतावनी दी गई थी कि काम बंद न करने की स्थिति में दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी, जिसकी प्रतिलिपि थाना प्रभारी कमलेश्वरपुर को भी आवश्यक कार्रवाई हेतु भेजी गई थी।

नाबालिग आदिवासियों से श्रम और झूठे मुकदमे की धमकी

​प्रार्थी का आरोप है कि कोर्ट के इस साफ आदेश के बावजूद अनावेदक रेवती यादव और उनके पुत्रों द्वारा जमीन पर न सिर्फ लगातार काम किया जा रहा है, बल्कि इसके लिए नाबालिग आदिवासी बच्चों को बाल श्रम में झोंक दिया गया है।

पीड़ित पक्ष का कहना है कि जब उन्होंने इस अवैध कार्य और कोर्ट के आदेश के उल्लंघन का विरोध किया, तो रेवती यादव और उनके बेटों द्वारा उन्हें डराया-धमकाया गया। प्रार्थी ने आरोप लगाया कि विरोध करने पर उन्हें नाबालिग बच्चों के माध्यम से ‘एट्रोसिटी एक्ट’ (SC/ST Act) के झूठे मुकदमे में फंसाने की खुली धमकी दी जा रही है।

स्टे लगे जमीन पर नाबालिक बच्चों को खेत में करवाया जा रहा है काम

पुलिस प्रशासन पर गंभीर आरोप

​इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल कानून व्यवस्था पर खड़ा हो रहा है। कोर्ट द्वारा कमलेश्वरपुर थाना प्रभारी को इस कार्य पर तत्काल रोक लगाने के निर्देश दिए गए थे। प्रार्थी का कहना है कि उन्होंने स्थगन आदेश के उल्लंघन और मिल रही धमकियों की लिखित शिकायत पुलिस को दी है, लेकिन आज पर्यंत तक पुलिस प्रशासन द्वारा अनावेदकों के खिलाफ कोई भी ठोस या दंडात्मक कार्रवाई नहीं की गई है। कोर्ट के आदेश की इस तरह अवहेलना और पुलिस की निष्क्रियता से पीड़ित परिवार भय के साए में जीने को मजबूर है।