बंद कार्यालय में सुनवाई दर्शाकर न्यायालय को गुमराह करने का आरोप, प्रशासनिक अभिलेखों की विश्वसनीयता पर उठे सवाल

सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र बगीचा जशपुरनगर
जिले की बगीचा तहसील से एक गंभीर मामला सामने आया है, जिसने न केवल राजस्व अभिलेखों की सुरक्षा और पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह खड़े किए हैं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया को प्रभावित करने की आशंका भी उत्पन्न कर दी है। आरोप है कि वर्ष 1986-87 का एक कथित फर्जी राजस्व प्रकरण तैयार कर उसे वैध बताने की कोशिश की गई, ताकि न्यायालय को गुमराह कर भूमि पर अवैध लाभ प्राप्त किया जा सके।

शिकायतकर्ता पक्ष द्वारा इस संबंध में आधा दर्जन से अधिक बार कलेक्टर से लिखित शिकायत की जा चुकी है, किंतु अब तक औपचारिक जांच प्रारंभ नहीं होने से प्रशासनिक कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं।


क्या है पूरा प्रकरण?

आवेदक पक्ष के अनुसार ग्राम बगीचा स्थित खसरा क्रमांक 176/3, रकबा 0.059 हेक्टेयर भूमि उनके पूर्वज स्वर्गीय सोहन लाल जैन की वैध संपत्ति है। आरोप है कि उक्त भूमि पर कब्जा करने की नीयत से विरोधी पक्ष द्वारा तहसील बगीचा के नाम से एक कथित नामांतरण प्रकरण क्रमांक 09/अ-6/1986-87, ग्राम कुरुमकेला तैयार किया गया।

दस्तावेजों की जांच में कई गंभीर विसंगतियां सामने आने का दावा किया गया है। आरोप है कि प्रकरण में दर्शाए गए आदेश पत्र, सुनवाई की तिथियां, हस्ताक्षर एवं अभिलेखीय प्रविष्टियां संदिग्ध हैं और प्रथम दृष्टया कूटरचित प्रतीत होती हैं।


रविवार को सुनवाई का उल्लेख

दस्तावेजों के अनुसार कथित प्रकरण की प्रथम सुनवाई 01 जून 1986 को दर्शाई गई है। अभिलेखों के अनुसार उक्त तिथि रविवार थी और उस दिन तहसील कार्यालय बंद था। सूचना के अधिकार (RTI) से प्राप्त जानकारी में भी उस दिन किसी सुनवाई या प्रकरण की प्रविष्टि दर्ज नहीं पाई गई।

यह तथ्य स्वयं में गंभीर प्रश्न उत्पन्न करता है कि बंद कार्यालय में सुनवाई किस प्रकार संभव हुई?


हस्ताक्षरों में भिन्नता और स्थानांतरण के बाद आदेश

शिकायतकर्ता का आरोप है कि तत्कालीन तहसीलदार के हस्ताक्षर कूटरचित प्रतीत होते हैं। बताया गया है कि दिनांक 24.06.1986 एवं 11.07.1986 को आदेश पत्र में तत्कालीन तहसीलदार आई.एम. सिंह के हस्ताक्षर दर्शाए गए हैं, जबकि उनका स्थानांतरण 18.06.1986 को हो चुका था।

इसके अतिरिक्त दायरा पंजी एवं अभिलेख पासबुक में उक्त प्रकरण का कोई उल्लेख नहीं पाया गया। आदेश पत्रों की स्याही, लिखावट तथा नोटशीट पर दर्ज हस्ताक्षरों में भी स्पष्ट भिन्नता बताई जा रही है। शिकायतकर्ता का दावा है कि नोटशीट में सोहनलाल के हस्ताक्षर भी कथित रूप से फर्जी बनाए गए हैं और लिखावट एक ही व्यक्ति की प्रतीत होती है।

यदि आरोप प्रमाणित होते हैं तो यह न केवल दस्तावेजी फर्जीवाड़ा, बल्कि न्यायालय को भ्रमित कर अवैध लाभ लेने का गंभीर आपराधिक प्रयास माना जाएगा।


न्यायिक और प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रश्न

यह मामला महज भूमि विवाद तक सीमित नहीं है। इससे व्यापक प्रश्न उठ रहे हैं—

  • क्या राजस्व अभिलेखों की सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त है?
  • क्या दशकों पुराने रिकॉर्ड में छेड़छाड़ संभव है?
  • यदि दायरा पंजी में प्रविष्टि नहीं है, तो प्रकरण अस्तित्व में कैसे आया?
  • क्या न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत दस्तावेजों का सत्यापन पर्याप्त रूप से होता है?

स्थानीय स्तर पर यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है। आमजन में भी यह चिंता उभर रही है कि यदि राजस्व रिकॉर्ड ही सुरक्षित नहीं हैं, तो आम नागरिक की संपत्ति कितनी सुरक्षित है?


वैज्ञानिक जांच की मांग

आवेदक पक्ष ने मांग की है कि—

  • हस्ताक्षरों की हैंडराइटिंग विशेषज्ञ से जांच कराई जाए।
  • दस्तावेजों की स्याही एवं कागज की आयु की वैज्ञानिक जांच हो।
  • संबंधित दायरा पंजी एवं मूल अभिलेखों को जब्त कर निष्पक्ष जांच कराई जाए।
  • दोषी पाए जाने पर संबंधित व्यक्तियों के विरुद्ध आपराधिक प्रकरण दर्ज किया जाए।

प्रशासन की परीक्षा

पूरा मामला अब जिला प्रशासन के संज्ञान में है। यदि जांच में फर्जीवाड़ा सिद्ध होता है तो यह केवल एक परिवार के साथ अन्याय का विषय नहीं रहेगा, बल्कि सरकारी अभिलेख प्रणाली की गंभीर विफलता के रूप में देखा जाएगा।

फिलहाल निगाहें प्रशासनिक कार्रवाई पर टिकी हैं। यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या आरोपों की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाती है या मामला कागजों तक ही सीमित रह जाता है।

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