सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र बिहारपुर/सूरजपुर:
सूरजपुर जिले के चांदनी बिहारपुर क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत कोल्हुआ से भ्रष्टाचार और सत्ता के दुरुपयोग का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। यहाँ के सरपंच राम लाल पण्डो द्वारा  वन विभाग की बेशकीमती तीन एकड़ जमीन का सौदा महज 1.50 लाख रुपये में कर दिया। इस अवैध सौदे को ‘सरकारी जामा’ पहनाने के लिए सरपंच ने अपने पद, सील और हस्ताक्षर का खुलेआम दुरुपयोग करते हुए पंचनामा भी तैयार किया है।
वीडियो वायरल, फिर भी अधिकारी मौन
हैरानी की बात यह है कि इस पूरे लेन-देन का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो चुका है, जिसमें स्पष्ट रूप से नियमों की धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं। इस पूरे मामले की जानकारी वन विभाग के आला अधिकारियों (DFO और SDO) को दी जा चुकी है। इसके बावजूद विभाग की चुप्पी कई बड़े सवाल खड़े कर रही है। क्या वन भूमि की सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले अधिकारी अब मूकदर्शक बनकर भू-माफियाओं और भ्रष्ट जन-प्रतिनिधियों को खुली छूट दे रहे हैं?

एसडीओ मनोज साह को क्यों लगी मिर्ची…?

जब इस मामले पर सारे दस्तावेज और वीडियो वायरल हो रहे थे तो इस बात की जानकारी डीएफओ सूरजपुर को देने के लिए कई बार फोन किया गया लेकिन उनके द्वारा कोई भी जवाब नहीं दिया गया एक शासकीय अधिकारी का यूं लापरवाह होना कहीं ना कहीं अपने पद के कर्तव्य से विमुख होना है क्योंकि अगर किसी घटना की जानकारी डीएफओ को देनी है और वह फोन ना उठा तो यह कहां तक सही है..? खैर फोन का जवाब ना आता देख इस मामले की जानकारी मैसेज के द्वारा उनको दी जा चुकी थी और उसके बाद भी कोई जवाब ना आता देख एसडीओ फॉरेस्ट मनोज शाह को फोन के माध्यम से जानकारी दी गई एसडीओ मनोज शाह ने बताया कि उन्हें हमारे फोन के माध्यम से इस बात की जानकारी हुई है इससे पूर्व उन्हें इस बात की जानकारी नहीं थी जिस पर हमारे द्वारा उन्हें खबर का अवलोकन करने और उसमें लगे साक्ष को एक बार देखने की निवेदन की गई इसके बाद मामले की जानकारी लेकर इस विषय पर अपना पक्ष रखने की बात एसडीओ फॉरेस्ट मनोज साह ने की जब दूसरे दिन एसडीओ मनोज शाह से फोन के माध्यम से मामले के विषय में जानने का प्रयास किया गया तो मनोज शाह खिसियानी बिल्ली खंबा नोचे के तर्ज पर आग बबूला हो उठे और उनके द्वारा हमारी खबर पर ही सवाल उठना चालू कर दिया गया उनका कहना था कि आपने हमारे साहब के खिलाफ में गलत न्यूज़ प्रकाशित किया है और तो और वह हमें नैतिकता का भी पाठ पढ़ने लगे, शायद एसडीओ साहब डीएफओ साहब के चहते बनने के चक्कर में पत्रकारों से ऐसा व्यवहार कर रहे थे एसडीओ साहब साहब को डर है कहीं उनकी पोल पट्टी दुनियां के सामने ना खुल के रह जाए शायद इसी लिए वो हमें झुंझलाहट दिखाने का प्रयास कर रहे थे और संभवतः इसी बहाने डीएफओ साहब शायद उन्हें अपना चहेता बना लेते। आपको बता दे की एसडीओ मनोज शाह की बातें बिल्कुल वैसे ही थी जैसे की अपने उच्च अधिकारी के गलतियों पर पर्दा डालने के लिए किया जाता हैं।मनोज शाह जो कि उच्च अधिकारी हैं और इस मामले पर क्या कार्रवाई होना चाहिए इस बात की भी उन्हें जानकारी नहीं है वह स्वयं नादान बालक के जैसे हमसे पूछने लगे कि इस पर क्या कार्रवाई बनती है। आपको बता दे की मनोज शाह या कोई भी शासकीय अधिकारी लोक सेवक होता है और लोक सेवा का कर्तव्य जनता के हितों में काम करना होता है लेकिन जिस बात की सैलरी मनोज शाह को मिल रही है उस काम को करने के बारे में उन्हें कुछ अता-पता ही नहीं है..? यह काफी हैरान करने वाला विषय है इतने बड़े पोस्ट पर होने के बावजूद अगर मनोज साह को अगर इस बात की जानकारी नहीं है कि कार्यवाही क्या बनती है तो इतने साल आखिर वन विभाग में उन्होंने क्या ही किया है उनके स्थान में यदि उनके ड्राइवर या चपरासी की बात की जाए तो उन्हें बहुत अच्छे से पता होगा कि उनका काम क्या है लेकिन एक एसडीओ फॉरेस्ट को इस बात की जानकारी नहीं है कि उन्हें क्या करना है या नहीं, इससे यह कहना गलत नहीं होगा कि एसडीओ के पोस्ट में भले ही बैठे हैं मनोज साह परन्तु एक चपरासी के बराबर उनको अपने काम की जानकारी नहीं हैं। पत्रकारों के खिलाफ बोलने से पहले मनोज साह जैसे अधिकारियों को अपने अंदर झांक कर देखना चाहिए कि क्या वो सही हैं इतने साक्ष्य सामने आने के बाद भी अगर वो बाहुबलियों के डर या रिश्वत की रकम से मौन हैं..!और सरपंच और खरीदने वाले जायसवाल पर कार्यवाही नहीं कर पा रहे हैं तो यह शर्म की बात है। मनोज साह के अधीनस्थ कर्मचारी भी शायद उनकी इस बेबसी या भ्रष्टाचारी पर आपसे में जरूर हंसते होंगे कि नाम के आगे इतने बड़े अधिकारी का टैग जरूर लगा है पर ऊंची दुकान और फीकी पकवान जैसा साहब का हाल है। खैर मनोज शाह एसडीओ साहब के जानकारी के लिए कुछ प्रक्रिया की जानकारी हम इस न्यूज में देंगे जो इस संबंध में सरपंच और खरीददार पर बनते हैं शायद इस बात से उन्हें कुछ जानकारी मिल सके, क्योंकि अपनी नाकामयाबी और कमजोरी का ठीकरा और झुंझलाहट पत्रकारों पर थोपने से अच्छा है कि एसडीओ साहब अपने घूमने वाली कुर्सी और AC वाले कमरे से उठकर थोड़ा सा काम ही कर लें इससे उनके स्वास्थ्य पर कोई विपरीत प्रभाव नहीं पड़ेगा बल्कि अगर जंगल में थोड़ा चलना भी पड़ेगा तो या स्वास्थ्य के लिए लाभदायक ही होता है शायद इस समाचार प्रकाशन के बाद एसडीओ साहब अपने मौन व्रत को तोड़ते हुए सरपंच और उनके सहयोगियों पर कोई कारवाही करने का विचार करें क्योंकि जंगल की रखवाली के लिए ही विभाग के द्वारा उनकी नियुक्ति की गई है वन विभाग का काम ही वनों की सुरक्षा वन्यजीवों की सुरक्षा करना है इसी बात की सैलरी एसडीओ मनोज शाह जैसे अधिकारियों को मिलती है।

पद का दुरुपयोग और कानून की अवहेलना
एक सरपंच, जिसका दायित्व गांव के विकास और सरकारी संपत्ति की रक्षा करना है, वही आज रक्षक से भक्षक की भूमिका में नजर आ रहा है। सरपंच की सील और हस्ताक्षर का उपयोग किसी निजी संपत्ति की तरह सरकारी जमीन को बेचने के लिए करना भारतीय वन अधिनियम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत एक दंडनीय अपराध है।
जनता के सवाल:
जब साक्ष्य (वीडियो और पंचनामा) सार्वजनिक हैं, तो अब तक एफआईआर (FIR) दर्ज क्यों नहीं हुई?
क्या जिला प्रशासन और वन विभाग इस गंभीर मामले में किसी राजनैतिक दबाव में काम कर रहा है?
क्या कोल्हुआ की यह तीन एकड़ जमीन अब भू-माफियाओं के हवाले ही रहेगी?
इस मामले में यदि जल्द ही दोषियों पर कार्यवाही नहीं होती, तो क्षेत्र के ग्रामीणों में रोष बढ़ना तय है। अब देखना यह है कि खबरें प्रकाशित होने के बाद कुंभकर्णी नींद में सोया वन विभाग जागता है या भ्रष्ट तंत्र इसी तरह सरकारी जमीनों की बंदरबांट करता रहेगा।

भारतीय वन अधिनियम, 1927 (Indian Forest Act) के तहत कार्यवाही
चूंकि भूमि “वन भूमि” है, इसलिए इस पर सीधे वन विभाग की कार्यवाही होगी:
धारा 26: यदि वह ‘आरक्षित वन’ (Reserved Forest) है, तो बिना अनुमति कब्जा करना या अतिक्रमण करना प्रतिबंधित है। इसके तहत जुर्माना और कारावास दोनों का प्रावधान है।
धारा 33: यदि वह ‘संरक्षित वन’ (Protected Forest) है, तो वहां भी नियमों का उल्लंघन करने पर सजा का प्रावधान है।
धारा 52 और 64: वन विभाग को अधिकार है कि वह अवैध कब्जे में इस्तेमाल की गई सामग्री को जब्त करे और अपराधी को बिना वारंट गिरफ्तार भी कर सकता है।
2. भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत आपराधिक मामले
सरपंच ने अपने पद का दुरुपयोग किया है और धोखाधड़ी की है, इसलिए ये धाराएं प्रभावी होंगी:
धोखाधड़ी (Cheating): सरकारी भूमि को अपनी बताकर या जाली दस्तावेज (विक्रय पत्र) बनाकर बेचना धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है।
दस्तावेजों में जालसाजी (Forgery): सरपंच द्वारा अपनी सरकारी सील और हस्ताक्षर का उपयोग किसी अवैध कार्य (वन भूमि बेचने) के लिए करना ‘फोर्जरी’ है।
लोक सेवक द्वारा विश्वासघात: एक सरपंच ‘लोक सेवक’ (Public Servant) होता है। यदि वह अपने पद का दुरुपयोग कर संपत्ति का गबन या अवैध हस्तांतरण करता है, तो यह गंभीर अपराध है।
3. प्रशासनिक और पंचायत राज अधिनियम के तहत कार्यवाही
सरपंच के खिलाफ प्रशासनिक स्तर पर भी कड़ी कार्यवाही होगी:
पद से पृथक करना (Removal from Post): पंचायती राज अधिनियम की संबंधित धाराओं के तहत, पद का दुरुपयोग करने और आपराधिक कृत्य में संलिप्त होने के कारण कलेक्टर या संबंधित अधिकारी सरपंच को पद से हटा सकते हैं।
रिकवरी (Recovery): जो पैसा वीडियो में लेते हुए दिख रहा है या जो अवैध लाभ कमाया गया है, उसकी वसूली (Recovery) के आदेश दिए जा सकते हैं।

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