सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र लटोरी सूरजपुर यहां आए दिन कोई न कोई कारनामे सामने आते ही रहते हैं,लेकिन एक तहसीलदार जिसको कोई और डरा धमका कर या फिर अपने पैसों से खरीद कर अपना काम करवाता हो या फिर उसे बेवकूफ बनाकर अपना काम निकाल लेता हो वह सिर्फ हमारी जानकारी में एक जगह पर होता है, जिसका नाम लटोरी तहसील है। आज हमारे पास कई ऐसे दस्तावेज हैं जिनमें तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने शासन के नियमों को तक पर रखते हुए हस्ताक्षर किए हैं। हम बात कर रहे हैं शासन से प्राप्त भूमि के पट्टे के खरीदी और बिक्री के संबंध में, यह एक प्रकार का ऐसा भूमि होता है जो की किसी जरूरतमंद को जीवन निर्वहन हेतु दिया जाता है और उसकी बिक्री भी विशेष परिस्थिति में संभव हो सकती है जिसके लिए जिले के कलेक्टर से अनुमति लेना अनिवार्य होता है,लेकिन तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा शायद खुद को कलेक्टर से भी ऊपर मानते हैं या फिर यूं कहें सरगुजा आयुक्त से भी खुद को ऊपर मानते हैं क्योंकि उन्होंने त्र्यंबक गुप्ता के लिए नियम विरुद्ध तरीके से रजिस्ट्री के पेपर तैयार किया और उस जमीन की रजिस्ट्रीहो गई, मामला यहां नहीं रुकता है एक अपने ही विभाग के पटवारी को भी तहसीलदार ने नहीं बक्शा और उसकी जमीन का नामांतरण उसकी जानकारी के बगैर करते हुए किसी और को भूमि स्वामी बना दिया जिस पर पटवारी का कहना है कि वह आवेदन देकर इस संबंध में कार्रवाई की मांग करेंगे।हमारे विश्वसनीय सूत्रों ने नाम प्रकाशित ना करने के शर्त पर बताया कि तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा के द्वारा त्र्यंबक गुप्ता के नाम पर रजिस्ट्री के दस्तावेज बनाने के लिए ₹100000 की रिश्वत ली गई थी और यह रिश्वत तथा कथित नेता और तथाकथित भूमि दलाल तथाकथित भू माफिया संजय गुप्ता के हाथों से ली थी, सूत्र ने आगे बताया कि तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा संजय गुप्ता के बहुत करीबी है और दोनों व्यक्ति मिलकर इस प्रकार के काले कारनामों को अंजाम देते हैं। बुंदिया निवासी त्रयंबक गुप्ता संजय गुप्ता का रिश्तेदार है जिसके चलते संजय गुप्ता ने षडयंत्र पूर्वक सब कुछ जानते हुए शासकीय मत से प्राप्त भूमि के खरीदी के लिए अपने रिश्तेदार त्र्यंबक गुप्ता को मनाया और तहसीलदार के साथ सांठ गांठ करते हुए और तहसीलदार को ₹100000 की रिश्वत देकर बिना पटवारी प्रतिवेदन के और बिना कलेक्टर के परमिशन के इस जमीन को अपने रिश्तेदार त्र्यंबक गुप्ता के हाथों बिकवा दिया। जब इस संबंध में तहसीलदार से बात किया गया तो तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने बताया कि जब उनकी पोस्टिंग नई-नई हुई थी इस दौरान कुछ विभाग के लोग और भूमि दलाल जैसे कुछ लोग उनके पास आते हैं और उन्हें विश्वास दिलाकर बिना पटवारी के हस्ताक्षर वाले दस्तावेजों पर पहले ही तहसीलदार के हस्ताक्षर ले लेते हैं, और जब इस पूरे धांधली के बारे में तहसीलदार को पता चला तो उन्होंने नामांतरण नहीं करते हुए इसे दो बार रिजेक्ट भी किया है। लेकिन सवाल उठता है कि तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा के द्वारा बिना जानकारी के केवल मौखिक वार्तालाप के आधार पर किसी दस्तावेज़ पर तहसीलदार की हैसियत से हस्ताक्षर क्यों किए..? क्या जो सूत्र बता रहे हैं की तहसीलदार सुरेंद्र ने एक हस्ताक्षर की कीमत ₹100000 ली है वह सही है…? क्या तथाकथित नेता तथा कथित भूमिया संजय गुप्ता ने सच में इस जमीन को हड़पने के लिए लालच में बिना परमिशन के खरीदी करने के उद्देश्य से तहसीलदार को रिश्वत दी है..? यदि तहसीलदार पाक साफ है तो केवल नामांतरण की प्रक्रिया को रोकना ही कहां तक सही है इस संबंध में कोई जानकारी अब तक अपने अधिकारियों को लिखित तौर पर क्यों नहीं दी..? क्या इस काले कारनामे में तहसीलदार ने भी अपने हाथ काले कर रखे हैं..? क्या रिश्वत रूपी शहद में तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने भी रोटी डुबोकर खाई है..? क्या सच में चंद पैसों की लालच में तहसीलदार ने अपने तहसीलदार वाले पोस्ट के सम्मान और स्वयं के स्वाभिमान को भी गिरवी रख दिया..? खैर यह सब तो जांच में साफ हो जाएगा और इन सभी प्रश्न चिन्हों पर मोहर लगती है या फिर तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा किसी और की साजिश का शिकार हुए हैं यह तो जांच के बाद ही साफ हो पाएगा खैर संभावनाओं का कोई अंत नहीं होता जो सवाल इन सभी दस्तावेजों को देखकर और परिस्थितियों के आधार पर दिमाग में आ रहे हैं वह सब कहीं ना कहीं तहसीलदार के द्वारा किए गए हस्ताक्षर के चलते हैं। यदि तहसीलदार ने अपने पद और मर्यादा को धूमिल ना करते हुए बिना कलेक्टर से अनुमति लिए इस शासकीय मत की जमीन का चौहद्दी निर्माण नहीं किया होता और बिना पटवारी प्रतिवेदन के भी नही किया होता तो आज इस विषय पर कोई चर्चा भी नहीं हो रही होती। लेकिन क्या तहसीलदार साहब इतने नादान हैं या फिर भोले भाले बच्चों की तरह हैं जो उन्हें कोई भी बेवकूफ बना सकता है..? या फिर वह ऐसे ही मौका की तलाश में रहते हैं की कोई पेचीदा मामला आए जिस पर बड़ा पैसा छपा जाय..? क्या विभाग के अधिकारी भी तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा का संरक्षण कर रहे हैं आखिर क्या एसडीएम और कलेक्टर तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा के वीवीआईपी रिलेशन के चलते चुप हैं..? क्या तहसीलदार की ऊंची पहुंच और वीवीआइपी रिश्तेदारों के दबाव में आकर एसडीएम शिवानी जायसवाल, कलेक्टर सूरजपुर एस जयवर्धने, आयुक्त सरगुजा संभाग नरेंद्र दुग्गा अब तक मौन हैं। आखिर तहसीलदार के इतने बड़े और वीवीआइपी दूर के रिश्तेदार कौन हैं जो उन्हें बचाने के लिए इतने बड़े अधिकारियों पर दबाव डाल रहे हैं क्या वो छत्तीसगढ़ के बड़े नेताओं में तो शामिल नहीं हैं..? तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा जब अपनी गलती स्वीकार चुके हैं तो भी उन्हें क्यों और किस वीवीआइपी के डर से क्षमादान दिया जा रहा है यह सोचने का विषय हैं। Post navigation आबकारी विभाग की नई सौगात,विदेशी मदिरा प्रेमियों के लिए — सूरजपुर के बस स्टैंड में 69 प्रीमियम ब्रांड अब एक ही स्थान पर आज कल मोटी चमड़ी के ढीठ हो गए हैं अधिकारी,सम्मान से अधिक पैसों को देते हैं महत्व इसी लिए रहते हैं मौन:– विशेष सूत्र