सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर लटोरी तहसील में लापरवाही अनियमितता और भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है,यहां रोज कोई ना कोई कारनामा शासन को ठेंगा दिखाते हुए जरूर ही होता है और उसपर मानो प्रशासन की कोई नजर नहीं पड़ती है या फिर उस पर कुछ खास बड़े लोगों पर विशेष कृपादृष्टि रख कर या अपनी मौन सहमति देकर उनके लिए नियमों में बदलाव किए जाते हैं। हम बात कर रहे हैं लटोरी तहसील से महज कुछ मीटर की दूरी पर प्रवीण कुमार जायसवाल की भूमि जो शासकीय भूमि के पीछे एक आदिवासी की भूमि तथा एसईसीएल की भूमि के बाद पड़ती हैं। जिसके चलते प्रवीण जायसवाल अपने शासकीय पद में होने का दुरुपयोग करते हुए अपने लिए रास्ते के निर्माण की बात कहते हुए शासकीय भूमि में अतिक्रमण कर रहे हैं और रास्ते का नाम लेकर उनके द्वारा शासकीय भूमि में लगभग 10 फीट ऊंचा कॉलम युक्त दीवार का निर्माण कराकर अवैध कब्जा किया जा रहा है। यहां हम शासकीय पद का दुरुपयोग का बात इसलिए कह रहे हैं क्योंकि प्रवीण कुमार जायसवाल आरटीओ विभाग में पदस्थ हैं और शासकीय नियम उन्हें बाकी आम लोगों से ज्यादा बेहतर पता है।प्रवीण कुमार जायसवाल को रोड की मांग शासन से कर नक्शा कटवा कर अपने लिए निकासी का साधन शासन के माध्यम से प्राप्त करना चाहिए था लेकिन अपने सरकारी पद और विभाग का धौंस दिखाते हुए प्रवीण कुमार जायसवाल के द्वारा बिना अनुमति प्राप्त हुए ही शासकीय भूमि पर दीवार का निर्माण कर अपने लिए निकासी का साधन बनाते हुए शासकीय भूमि पर अतिक्रमण किया जा रहा है। किसी व्यक्ति के लिए निकासी का साधन एक अहम जरूरत होता है जिससे वह मुख्य मार्ग से होकर अपने गंतव्य तक जा सके लेकिन इसके लिए भी एक बहुत अच्छी और सुविधाजनक कानूनी प्रक्रिया है जिसके तहत तहसील से अनुमति लेकर रोड का निर्माण कराया जा सकता था और आदिवासी प्लॉट तथा SECL से अनुमति लेकर भी उनकी जमीन पर रोड का निर्माण कराया जा सकता था लेकिन जब कानून के जानकारी और सरकारी विभाग में बैठे लोग ही कानून की धज्जियां उड़ाने लगेंगे तो बाकी लोगों में क्या संदेश जाएगा यह बताने की जरूरत नहीं है। जब इस विषय पर प्रवीण कुमार जायसवाल से बात किया गया तो प्रवीण कुमार जायसवाल ने यह स्वीकार किया कि उनके द्वारा तहसील से महज कुछ दूरी पर स्थित अपने भूमि पर जाने आने के साधन के रूप में 30 से 40 फीट लंबी शासकीय भूमि पर दीवार का निर्माण कराया जा रहा है जिसके लिए अभी तक उनके पास कोई भी अनुमति नहीं है। इस विषय पर जब हमने राजस्व निरीक्षक से बात की तो उन्होंने बताया कि इस विषय में उन्हें जानकारी है और प्रवीण कुमार जायसवाल को ऐसा करने से रोका भी जा चुका है लेकिन प्रवीण कुमार जायसवाल के द्वारा यह निर्माण किया जा रहा है इस बात को उन्होंने स्वयं भी स्वीकारा है। आपको बता दें कि एक और जहां रजक बंधुओं के घर को माननीय उच्च न्यायालय बिलासपुर से स्थगन आदेश मिलने के बाद भी न्यायालय के आदेश की अवहेलना करते हुए तोड़ दिया गया था जबकि विवादित भूमि पर राजेश रजक के चाचा द्वारा भी कब्जा किया गया है जिसे नहीं तोड़ा गया यह तहसील द्वारा किया गया एक दोषपूर्ण,पक्षपातपूर्ण या फिर सौतेला व्यवहार कहा जा सकता है।

प्रवीण जयसवाल द्वारा तहसील से महज कुछ मीटर की दूरी पर किया जा रहा निर्माण बेधड़क धड़ले से दिन के उजाले में कैसे संभव हो रहा है यह एक सवालिया निशान है। क्या तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा कुछ मामलों में कंप्रोमाइज कर लेते हैं और कुछ लोग जो माध्यम या निम्न वर्ग के होते हैं जो कुछ सेटलमेंट करने में सक्षम नहीं होते हैं उनके ऊपर कार्यवाही कर वाहवाही लूटते हैं। आपको बता दें कि ऐसे कई मामले तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा के विरुद्ध है जिन्हें हमारे द्वारा धीरे-धीरे प्रकाशित किया जा रहा है जिसमें उनके पक्षपात पूर्ण तथा न्यायपालिका के विधान के विपरीत कार्य करने के जानकारी हमें मिले हैं।

त्र्यंबक गुप्ता पर इतना मेहरबान क्यों हो गए थे तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा……?

कुछ भूमाफियाओं के साथ सांठ गांठ संबंध में हमें जानकारी मिली थी इसमें नियम विरुद्ध तरीके से जमीन की रजिस्ट्री करने का श्रेय तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा को जाता है ऐसा दस्तावेज को देखने से और सूत्रों की बातों से प्रतीत होता हैं। एक सूत्र ने बताया कि हरिपुर निवासी संजय गुप्ता जो कि व्यापार के साथ साथ जमीन दलाली का भी काम करता है उसके छोटे पुत्र जिसे ब्रेन ट्यूमर की बीमारी है उसके इलाज के लिए पैसे की आवश्यकता होने पर इस जमीन के दलाली से मिलने वाले पैसों के लालच में और अपने छोटे बेटे के इलाज के लिए संजय गुप्ता के द्वारा जल्दबाजी में तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा से त्र्यंबक गुप्ता के जमीन के रजिस्ट्री के लिए हस्ताक्षर करवा लिया गया बाद में जब तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा को पता चला कि यह जमीन शासकीय मत से प्राप्त हुआ है और इसका कलेक्टर परमिशन नहीं है तो इसके बाद इसका नामांतरण नहीं किया। लेकिन एक अन्य सूत्र ने बताया कि तहसीलदार ने पैसे लेकर इस दस्तावेज पर अपने हस्ताक्षर किए और ट्रांसफर से पूर्व इसका नामांतरण त्र्यंबक गुप्ता के हक में करने का वादा संजय और त्र्यंबक गुप्ता को किया हैं।

ऐसे एक शासकीय जमीन जिसका नामांतरण ग्रामसभा के आधार पर सचिव निरंजन दुबे के द्वारा अपने हक में स्वयं किया गया है जिसमें भी शासकीय मत से प्राप्त होने के बावजूद अनुमति नहीं ली गई थी और सचिव निरंजन दुबे के द्वारा अपने कार्यकाल में अपने हक में यह नामांतरण करना एक संदेह उत्पन्न करता है कि इस प्रकरण में भी शासन के नियमों को ताक पर रखते हुए यह नामांतरण किया गया था।इस विषय पर संक्षिप्त में साक्ष्यों के साथ जल्द ही प्रकाशित किया जाएगा।

खैरा मामले कई हैं लेकिन अब तक सुरेंद्र पैकरा के द्वारा विधि संगत कारवाही इन मामलों पर नहीं की गई हैं। क्या सच में तहसीलदार पूंजीपतियों और पैसे वालों से पैसे लेकर खुला समर्थन देते हैं और गरीबों पर कार्यवाही करते हैं यह एक बड़ा सवाल हैं।

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