सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र लटोरी

क्या सूरजपुर कलेक्टर एस जयवर्धने को लटोरी तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा पर कार्यवाही करने से मुख्यमंत्री का नाम लेकर रोका जा रहा है…?

क्या कलेक्टर साहब पर CM साहब के नाम का बनाया जा रहा है दबाव..?

क्या CM साहब के सच में करीबी रिश्तेदार हैं लटोरी तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ?

क्या मुख्यमंत्री का करीबी होना ही विधि विरुद्ध काम करने का लाइसेंस दे देता है?

क्या सच में मुख्यमंत्री के करीबी रिश्तेदार हैं सुरेंद्र पैकरा इसी लिए कलेक्टर भी कार्यवाही का नहीं जुटा पा रहे हैं साहस?

लटोरी में जमीन को लेकर भूमाफिया काफी सक्रिय है जिनके चलते आए दिन नियमों को ताक पर रखते हुए जमीनों के रजिस्ट्री के दस्तावेज बनाए जा रहे हैं। यहां तहसीलदार के पद में बैठे सुरेंद्र पैकरा कई बार शासकीय नियमों को तोड़ मरोड़ कर अपने कुछ चहेतों को लाभ पहुंचा चुके हैं।l,कई लोगों को जो उनके चहेते हैं या जिनसे उनको फायदा है।अपने पद का दुरुपयोग करना कोई पैकरा जी से सीखे क्योंकि यहां कई ऐसे दस्तावेज हैं जिनपर तहसीलदार के हस्ताक्षर नहीं होने चाहिए थे लेकिन बावजूद इसके नियमों को ताक पर रखते हुए कई दस्तावेजों पर हस्ताक्षर किए गए हैं। आपको बता दें कि शासकीय मत से प्राप्त भूमि की बिक्री के पूर्व कलेक्टर से परमिशन लेना अनिवार्य होता है लेकिन कुछ जमीन दलालों और खुद को मुख्यमंत्री का रिश्तेदार बताने वाले तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने मिलीभगत करते हुए ऐसी जमीनों का रजिस्ट्री कराया है जिस पर कलेक्टर का परमिशन या अनुमति अनिवार्य है। जब शासकीय मद से प्राप्त भूमि पर कलेक्टर की अनुमति नहीं ली गई थी तो कई जमीन के रजिस्ट्री कैसे हुए..? जब पटवारी का प्रतिवेदन तक नहीं मिला था तो तहसीलदार साहब को इतनी जल्दबाजी किस बात की थी कि उन्होंने पटवारी प्रतिवेदन का इंतजार तक क्यों नहीं किया..? क्या तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा हस्ताक्षर करने से पहले पटवारी से इसके संबंध में जानकारी नहीं ले सकते थे..? क्या ऐसी मजबूरी थी कि पटवारी प्रतिवेदन के बिना ही उन्हें दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने पड़े.? क्या उनको इसके विषय में जानकारी ही नहीं है..? क्या तहसीलदार साहब को इसके लिए कोई मोटी रकम मिली थी..? कई ऐसे सवाल हैं जो तहसीलदार के कार्यों पर उठ रहे हैं कि आखिर तहसीलदार ने आज तक इस गलती के सुधार के लिए कोई ठोस कदम क्यों नहीं उठाए..? किसी त्रुटिवस भी तहसीलदार के हस्ताक्षर रजिस्ट्री वाले पेपर पर हो गए तो भी उनके द्वारा खामोश रहना और नामांतरण की प्रक्रिया को रोक कर रखना एक सवालिया निशान है अगर उन्हें किसी दबाव में या त्रुटिवस इन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवाए गए हैं तो गलत तरीके से हुए रजिस्ट्री को अब तक निरस्त करने के लिए तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने अब तक कोई कदम क्यों नहीं उठाया है। स्पष्ट है कि जो अपनी गलती छुपाने के लिए तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा बोल रहे हैं वो गलत है और केवल अपने आप को बचाने किए लिए किया जा रहा प्रयास मात्र हैं परन्तु सच्चाई कुछ और ही है। हो सकता है इन दस्तावेजों के काले कारनामों में उन्होंने भी मोटी रिश्वत लेकर अपना हाथ काला किया होगा, जो अब तक सब कुछ जानते हुए मौन हैं..?। अगर खुद को मुख्यमंत्री का रिश्तेदार बताते समय इतना गर्व महसूस करते हैं तो फिर उनसे कौन जबरजस्ती इन दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करवा सकता हैं और यदि सब कुछ जानते हुए हस्ताक्षर किया तो संभवतः रिश्वत मिला होगा..? अगर तहसीलदार ने रिश्वत से अपना जेब नहीं भरा है तो अब तक इस प्रकरण को कलेक्टर या अपने किसी उच्च अधिकारी के संज्ञान में डाल कर इस विषय पर कोई कारवाही क्यों नहीं करवाया? अगर उनके द्वारा रिश्वत नहीं ली जाएगी होती तो वे दूसरों के विरुद्ध कार्यवाही जरूर करवा चुके होते लेकिन अगर रिश्वत से जेब भरी हो तो फिर कोई कुछ क्यों ही बोलेगा?

क्या सच उजागर होने के बाद भी कुछ इतने मोटी चमड़ी के कुछ अधिकारी हैं कि अपने किए पर शर्मिंदा तक नही है.?

इस एक मामले में कई मामले सामने आ चुके हैं जो स्पष्ट तौर पर यह बताते हैं कि क्या गलतियां हुई है,लेकिन जिसके अंदर शर्म ही ना हो और जो रिश्वत या अपने प्रभुत्व के दम पर गलतियां कर भी खुद को सही मानता हो ऐसा कोई अधिकारी हो या दलाल उसके लिए यह आम बात हो जाती हैं।

क्या सच में मुख्यमंत्री से है तहसीलदार का कोई रिश्ता..?

सूत्र बताते हैं कि सुरेंद्र पैकरा खुद को मुख्यमंत्री का करीबी रिश्तेदार होने का दावा करते हैं लेकिन इसकी पुष्टि नहीं हो पाई है कि सच में मुख्यमंत्री से तहसीलदार का कोई रिश्ता है,लेकिन रिश्ता हो तब भी क्या इससे भ्रष्टाचार करने का लाइसेंस मिल जाता है और इससे अपनी गलतियों पर पर्दा डालना उचित है..? आज कल अक्सर देखा गया है कि जब कोई आस पड़ोस का या फिर दूर का व्यक्ति भी नेता, मंत्री, मुख्यमंत्री, विधायक आदि बनते हैं तो लोग उनके साथ फोटो खिंचवाना और उसे अपने व्हाट्सएप के स्टेटस फेसबुक प्रोफाइल या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर डालकर इतनी वाहवाही उठाते हैं कि मानो उसे वीआईपी के साथ उनका घर का रिश्ता हो और फिर उनके जन्म दिन या किसी विशेष पर्व पर उन्हें अंकल जी वगैरा वगैरा कह कर बधाई संदेश अपने व्हाट्सएप में डालते हैं मानो सच में वह वीआईपी उनके व्हाट्सएप के स्टेटस देखता भी हो। फोटो खिंचवाना या फिर एक ही समाज से होना या फिर स्वयं रिश्तेदार भी होना किसी को भी गलत करने और अपने पद की गरिमा को महज चंद कागज के नोटों पर बेचने का अधिकार नहीं देता है। कोई भी अधिकारी, चपरासी हो या फिर तहसीलदार किसी को भी खुद को शासन से बड़ा नहीं समझना चाहिए लेकिन सूत्र बताते हैं कि ऐसा लटोरी तहसील में हो रहा है। अपनी पहचान ना उजागर होने के शर्त पर सूत्रों ने हमें बताया कि खुद को मुख्यमंत्री का रिश्तेदार बताकर अपनी भौकाली जमाने और अपने बड़े अधिकारियों को दबाने का काम भी तहसीलदार द्वारा किया जा रहा है।सूत्र बताते हैं कि अपने ट्रांसफर को रुकवाने के लिए भी तहसीलदार के द्वारा बड़े नेताओं के पीए से फोन करवा कर अपने ट्रांसफर को रोक दिया जाता है और यह सब केवल धांधली करने और गलत प्रकरणों में गलत काम करते हुए पैसा कमाने के उद्देश्य से तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा द्वारा किया जा रहा है।

क्या सच में मुख्यमंत्री के करीबी रिश्तेदार हैं, इसीलिए नहीं हो रही कार्रवाई?

प्रमाण के साथ कई बार खबर प्रशासन के बावजूद भी सुरेंद्र पैकरा कहीं अपने रिश्तेदारों के पहुंच का फायदा उठाते हुए अपने ऊपर होने वाले कार्रवाई को रोक तो नहीं रहे हैं क्या सच में लटोरी में इतने धांधली भरे मामले हैं कि उन्हें गाढ़ी कमाई तहसीलदार साहब को मिल रही है कि वो अपने उपर कारवाही होने से पहले ही उसे फोन करवा कर रोक देते हैं।सूत्रों की माने तो चच्चा विधायक हैं हमारे से अब सीधा मुख्यमंत्री रिश्तेदार हैं हमारे वाली बात सुनने को मिल रही हैं।

त्र्यंबक गुप्ता के नाम जमीन की रजिस्ट्री विधि विरुद्ध,फिर भी खामोश प्रशासनिक अमला

त्र्यंबक गुप्ता के नाम शासकीय मद की भूमि की रजिस्ट्री हुई यह विधि विरुद्ध था इसे समझने के लिए इन बिंदुओं को समझिए यह जमीन मिली जानकारी के अनुसार जुगुल बरगाह के नाम से शासकीय पट्टा सन् 1994 में मिला जिसे महज 1 वर्ष के बाद गीता सिंह ने सन् 1995 में रजिस्ट्री करवाई जिसके बाद त्र्यंबक गुप्ता ने 2024 में रजिस्ट्री करवाई सभी रजिस्ट्री में परमिशन नहीं लिया गया है। हैरानी की बात है कि यह जमीन शासकीय मद वक्त से प्राप्त थी और इसके पट्टा मिलते ही इसे बेच दिया गया और इसके लिए कलेक्टर परमिशन नहीं लिया गया था। बाद में त्र्यंबक के साथ भी यही कारनामा दोहराया गया। कुछ जानकारों का कहना है कि यह संजय गुप्ता के इशारे में त्र्यंबक गुप्ता द्वारा किया गया है, असल में इस कारनामे का मास्टरमाइंड संजय गुप्ता है क्योंकि उसके कहने से ही त्र्यंबक ने इस जमीन में अपना पैसा फसाया था। सब कुछ जानते हुए प्रशासनिक अमला खामोश है इसका मतलब समझौता हो सकता है? शायद तक प्रशासनिक अमले पर तहसीलदार के कहने पर उच्चस्तरीय लोगों के दबाव आ रहे हो या फिर सभी तक रिश्वत पहुंच चुकी होगी जिसके चलते सभी मौन है..?

नूरुल हसन की जमीन बिना कलेक्टर परमिशन के सविता कुंडू के नाम हो जाती जिसमें भी नामांतरण तहसीलदार के द्वारा कर दिया गया है,लेकिन सोचने वाली बात है कि आखिर ऐसा एक ही अधिकारी के द्वारा बार बार कैसे और क्यों किया जा रहा है,जबकि यह नामांतरण से पूरे जमीन के बिक्री में कलेक्टर की अनुमति नहीं ली गई थी। नूरुल हसन के इसी जमीन के एक और रजिस्ट्री के में लटोरी ग्राम के तात्कालिक सचिव निरंजन दुबे के द्वारा शासकीय मद की भूमि की खरीदी की गई और नामांतरण भी स्वयं के द्वारा ग्राम सभा के माध्यम से अपने पक्ष में किया।क्या सचिव निरंजन दुबे को इसके संबंध में जानकारी नहीं थी कि शासकीय मद के भूमि के क्रय विक्रय से पूर्व कलेक्टर से अनुमति लेना अनिवार्य है या फिर जमीन के लालच में उन्होंने भी नियमों को अपने अनुसार परिवर्तित करते  हुए अपने लिए प्रयोग किया।

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