सुशासन का सरकता हुआ चेहरा: क्या जनता ने यह भरोसा बेकार दे दिया?


छत्तीसगढ़।जनता ने बड़ी उम्मीदों के साथ जिस सरकार को सुशासन का प्रतीक मानकर चुना, आज वही सरकार सवालों के घेरे में है। लोग अमन-चैन की जिंदगी जीना चाहते हैं, पर क्या वास्तव में राज्य की बागडोर संभालने वाले मुखिया अपने काबिलियत के बल पर सरकार चला पा रहे हैं? यह सवाल अब सड़कों से लेकर सोशल मीडिया तक गूंज रहा है।

आज हालात यह हैं कि शहरों में मारपीट, लूट, चोरी, हत्या जैसी घटनाएँ आम हो गई हैं। युवा वर्ग नशे की गिरफ्त में जकड़ता जा रहा है। परिवार भयभीत हैं, माताएँ चिंतित हैं, और आम नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। पुलिस और प्रशासन की ढीली कार्यप्रणाली से जनता में असंतोष गहराता जा रहा है। कानून व्यवस्था की डोर ढीली पड़ चुकी है, और सुशासन का चेहरा अब धीरे-धीरे खोखला साबित हो रहा है।

इसी बीच सूरजपुर जिले का ताज़ा मामला शासन की जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है। एक स्थानीय संपादक ने तहसीलदार की कथित मनमानी और भ्रष्टाचार पर खबर प्रकाशित की। इस खुलासे के बाद पत्रकार को जान से मारने की धमकी मिली। पत्रकार ने अपनी सुरक्षा के लिए आईजी सरगुजा से कार्रवाई की मांग की, लेकिन अब तक किसी ठोस कदम का न लिया जाना हैरानी और निराशा दोनों पैदा करता है।

क्या यह वही ट्रिपल इंजन सरकार है, जो पारदर्शिता और सुरक्षा का दावा करती थी?

क्या अब इस राज्य में पत्रकारिता करना अपराध बन गया है?

जब पत्रकार और शिकायतकर्ता ही सुरक्षित नहीं, तब आम नागरिक किस पर भरोसा करे?

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या प्रशासन अब स्वतंत्र रूप से कार्य करने में सक्षम नहीं रहा? या फिर सत्ता के दबाव में सच्चाई को दबा देना ही नई कार्यशैली बन गई है?

जंगल कट रहे हैं, वन्यजीव बस्तियों में भटक रहे हैं, स्वास्थ्य केंद्रों में सोनोग्राफी जैसी बुनियादी सुविधाएँ नहीं हैं, परंतु अफसरशाही और सत्ताधारी वर्ग सिर्फ कुछ चहेतों के विकास में मशगूल दिखाई दे रहे हैं। जनता के हिस्से में केवल वादे, शिकायतें और बेबसी बची है।

अब वक्त है कि सरकार आत्ममंथन करे
जनता ने विश्वास दिया, पर बदले में उसे भय, असुरक्षा और अराजकता मिली। सुशासन का अर्थ केवल नारा नहीं — जवाबदेही, पारदर्शिता और न्याय है। जब तक यह तंत्र निष्पक्ष नहीं होगा, तब तक जनता का भरोसा शासन से लगातार दूर होता रहेगा।

सवाल यही है — क्या अब भी ‘सुशासन’ जिंदा है या यह सिर्फ सत्ता की शोभा बनकर रह गया है?

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