सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर क्या एक तहसीलदार पर कार्यवाही करने से विभाग की छवि न हो खराब इस लिए तहसीलदार को बचा रहे उच्च अधिकारी..? आखिर बिना कलेक्टर के अनुमति के रजिस्ट्री हुई जमीन पर अब तक मौन क्यों हैं प्रशासन..? क्या कानून सबके लिए अलग अलग है जो अब इतने साक्ष्य और सुरेंद्र पैंकरा के कबूलनामें के बाद भी चुप बैठे हैं वरिष्ठ अधिकारी..? आखिर इतने बड़े घोटाले के बाद वो कौन गॉडफादर है जो सुरेंद्र पैंकरा पर कार्यवाही नहीं होने दे रहा है..? क्या किसी गॉडफादर के दम पर अब तक सुरेंद्र पैंकरा पर नहीं ही कार्यवाही या अधिकारी खुद सुरेंद्र पैंकरा को बचाने पर अड़े हैं..? मानहानि की नोटिस भेजने से पहले क्या तहसीलदार भूल गए थे कि उन्होंने खुद क्या बयान दिया और साक्ष्य क्या कहते हैं या यह नोटिस पत्रकारों को डराने के लिए दिया गया लीगल धमकी था..? बाइट में अपनी गलती स्वीकारने और इतने सबूत होने के बाद भी ऐसी कौनसी जांच हो रही है जो आज तक पूरी ना हो सकी,कहीं ये अपने तहसीलदार को बचाने के लिए किया जा रहा विभागीय षडयंत्र तो नहीं..? सारांश: लटोरी तहसीलदार के द्वारा शासकीय मद से प्राप्त भूमि को बिना कलेक्टर के परमिशन और बिना पटवारी प्रतिवेदन के ही चौहद्दी निर्माण किया गया जिससे राजस्व की धारा 165/7 (ख) का स्पष्ट तौर पर उल्लंघन करते हुए कई जमीनों के रजिस्ट्री हुई है, और कई ऐसे जमीन है जिनका नामांतरण तक हो चुका है हालांकि जब मामला प्रकाश में आया तब तहसीलदार के द्वारा गलती को छुपाते हुए नामांतरण की प्रक्रिया को रोक कर रखा गया है। तहसीलदार ने अपनी गलती सिंधु स्वाभिमान को दिए अपने बयान में स्वीकार कि है। लटोरी तहसीलदार सुरेंद्र साय पैंकरा जो खुदको काफी बड़े लोगों का रिश्तेदार होना बताते हैं ऐसे पड़े लिखे योग्य व्यक्ति के द्वारा आखिर बिना कलेक्टर के अनुमति वाले जमीन को किसी के कहने मात्र से भरोसे में आकर चौहद्दी कैसे बना सकते हैं यह एक सवाल हैं जिसका जवाब खुद तहसीलदार सुरेंद्र पैंकरा ही दे सकते हैं साथ ही उन्हें यह भी बताना चाहिए कि उनका वेतन शासन से आता है या फिर उन लोगों के द्वारा दिया जाता है जो उन्हें अपनी बातों में लेकर भरोसा दिलाकर कि बाद में पटवारी से हस्ताक्षर करवा लेंगे वो लोग देते हैं.? क्योंकि अगर उन्हें शासन के माध्यम से वेतन मिलता है तो उन्हें काम भी शासन का करना चाहिए ना कि किसी के बहकावे में आकर। कलेक्टर के बिना अनुमति के ही कई जमीन ऐसे हैं जिनकी चौहद्दी का निर्माण तहसीलदार के द्वारा किया गया है और वह भी बिना पटवारी प्रतिवेदन के। हमें दिए अपने बयान में तहसीलदार ने स्वयं स्वीकार किया है कि बिना पटवारी प्रतिवेदन के ही उन्होंने चौहद्दी पर साइन किए थे जो की नियम विरोध है।आखिर इतने बड़े मामले पर पर्याप्त साक्ष्य और तहसीलदार का दिया हुआ बयान होने की बावजूद ऐसी कौन सी शक्ति है जो जिला प्रशासन को तहसीलदार के ऊपर उचित कार्रवाई करने से रोक रही है ऐसी भेदभावपूर्ण नीति के चलते जिले में ही नहीं अपितु पूरे देश में राजस्व विभाग के प्रति एक मिली भगत और भेदभावपूर्ण कार्रवाई का संदेश जा रहा है। तहसीलदार के द्वारा कलेक्टर से परमिशन हुए बिना ही जमीन के चौहद्दी का निर्माण किया गया है और तो और यह एक या दो मामला नहीं है बल्कि ऐसे कई मामले हैं जिनके साक्ष्य शासन को उपलब्ध कराए गए हैं लेकिन शासन प्रशासन शायद तक मामले के शांत होने का इंतजार कर रहा है ताकि बाद में इस मामले को किनारा करते हुए पूर्व की भांति अपना काम कर सकें लेकिन खुद को काफी बड़ी लोगों का रिश्तेदार बताने वाले तहसीलदार को खुद बताना चाहिए कि वो कौन से लोग थे जिनके दबाव में आकर या यूं कहीं भरोसे में आकर जो कि उन्होंने अपने बयान में कहा है चौहद्दी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए,जिनका बाद में रजिस्ट्री और कुछ का नामांतरण हुआ। जिस नियम विरुद्ध तरीके से जमीनों के रजिस्ट्री हुई और तो और कुछ जमीनों के नामांतरण भी हुए जो कि शासन की नियमानुसार नहीं होने चाहिए थे।वो कौन लोग थे जिन्होंने तहसीलदार को अपनी बातों में लेकर भरोसा दिलाकर चौहद्दी के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवाए जिससे राजस्व की धारा 165/7 (ख) का उल्लंघन हुआ। यह समझ से परे है कि जो व्यक्ति राजस्व का अधिकारी हो और इतने बड़े जिम्मेदार पद पर बैठा हो उसे कोई भरोसे पर कैसे ले सकता है वह भी गलत काम करने के लिए कहीं ना कहीं इस बात से यह अंदाजा लगाया जा सकता है की तहसीलदार ने किसी अनैतिक लाभ की चाहत में कलेक्टर से बिना अनुमति प्राप्त जमीनों तथा बिना पटवारी प्रतिवेदन के या यू कहें पटवारी प्रतिवेदन का इंतजार किए बिना ही चौहद्दी निर्माण करते हुए अपने हस्ताक्षर किए। यह कोई स्मूथ चलने वाले पेन का एडवर्टाइजमेंट नहीं था जिसकी स्मूदनेस देखकर तहसीलदार साहब हस्ताक्षर पर हस्ताक्षर करते चले गए और उन्हें यह ज्ञात ही नहीं रहा क्यों क्या गलत कर रहे हैं। तहसीलदार साहब कोई दूध पीते बच्चे नहीं हैं जिन्हें लॉलीपॉप के लालच में कोई अपनी बातों पर ला सकता है बल्कि वह एक जिम्मेदार पद पर बैठे अधिकारी हैं जिनका काम है सभी दस्तावेजों का बारीकी से अध्ययन कर उसे पर कोई निर्णय लेना है, लेकिन इतनी गलतियां होने और उनके विरुद्ध दस्तावेज साक्ष्य के साथ शिकायत होने के बावजूद आज तक राजस्व विभाग उनके विरुद्ध कोई भी कार्रवाई करने से परहेज कर रहा है। शायद विभाग को ऐसे ही लोग पसंद आते हैं जो बस रिजल्ट देते हो प्रशासन को इस बात की चिंता नहीं है कि वह गलत तरीके से हो रहा है या सही। आखिर इतने समय बीत जाने के बाद भी प्रशासन चुप क्यों है और उन्हें किस बात का इंतजार है जबकि दस्तावेजिक साक्ष्य स्पष्ट रूप से तहसीलदार के कारनामों की कहानी बता रहे हैं। Post navigation सड़क मरम्मत में ठेकेदार द्वारा बरती जा रही लापरवाही, जिला पंचायत सदस्य नरेंद्र यादव ने कलेक्टर को सौंपा ज्ञापन बाबा श्याम के भजनो की अमृतवर्षा से गुंजायमान होगा शहर