सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर लटोरी सरकारी जमीन के सौदेबाजी के आरोपों में घिरे लटोरी के ‘कारनामेबाज’ तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा को बचाने के लिए प्रशासनिक गलियारों में एक नया खेल शुरू हो गया है। विभागीय जांच की जिम्मेदारी संभाल रहीं SDM शिवानी जायसवाल की कार्यप्रणाली पर अब गंभीर सवाल उठ रहे हैं। आरोप है कि तहसीलदार के गंभीर अपराधों को महज ’सद्विक त्रुटि’ (लिपिकीय गलती) बताकर रफा-दफा करने की पुरजोर कोशिश की जा रही है।
एक बार गलती, छह बार ‘साजिश’?
तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने कैमरे के सामने यह स्वीकार किया था कि उनसे ‘त्रुटिवश’ हस्ताक्षर हुए हैं। लेकिन नियम कहते हैं कि किसी भी शासकीय जमीन की खरीदी-बिक्री से पूर्व कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य है। अब सवाल यह उठता है कि क्या तहसीलदार इतने ‘अनजान’ थे कि उन्हें यह बुनियादी नियम पता नहीं था? और यदि यह गलती थी, तो 6 अलग-अलग जमीनों के मामलों में एक ही तरह की ‘त्रुटि’ कैसे दोहराई गई? क्या यह तहसीलदार अपने उच्चाधिकारियों के सामने ‘नतमस्तक’ हो गए थे या फिर पर्दे के पीछे ‘नोटों की चमक’ ने कलम की दिशा बदल दी?
SDM की भूमिका पर गहराता संदेह
जांच का जिम्मा संभाल रहीं SDM शिवानी जायसवाल का जांच प्रतिवेदन अब चर्चा का विषय बना हुआ है। भ्रष्टाचार के इतने स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद उसे ’सद्विक त्रुटि’ का नाम देना, न्याय की आंखों पर पट्टी बांधने जैसा है। क्या एसडीएम साहिबा अपने मातहत को बचाने के लिए खुद नियमों की बलि दे रही हैं? प्रशासन की यह ‘उदारता’ भ्रष्टाचार को संरक्षण देने की ओर इशारा करती है।SDM शिवानी जायसवाल और उनके पति डॉ आयुष जायसवाल का विवादों से पूर्व से नाता रहा है आपको बता दें कि अम्बिकापुर के नवापारा के हॉस्पिटल में 90 लाख के दवाओं की खरीदी घोटाले में डॉ आयुष जायसवाल के भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं और इस मामले में जांच की जा चुकी है पर आगे की कार्यवाही अधर में लटी हुई है। हमारे सूत्र ने बताया कि इस मामले को सद्विक त्रुटि का नाम इस लिए भी दिया गया क्योंकि बिना कलेक्टर के अनुमति के ही SDM शिवानी जायसवाल के चाचा ने भी जमीन खरीदा और उसका नामांतरण भी हुआ अब चाचा मुंहबोले हैं या आगे ये तो मैडम ही बता पाएंगी।
मानहानि का डर दिखाकर सच दबाने की कोशिश
जब पत्रकारों ने इस भ्रष्टाचार की कलई खोली, तो तहसीलदार पैकरा ने ‘मानहानि’ का नोटिस थमाकर उन्हें डराने का प्रयास किया। लेकिन लटोरी की जनता पूछ रही है—जिस अधिकारी की साख खुद उसके कबूलनामे और कारनामों से तार-तार हो चुकी हो, उसकी प्रतिष्ठा और सम्मान अब बचा ही कितना है? सच लिखने वाले कलमकारों को नोटिस भेजना केवल अपनी कमजोरी छुपाने का एक नाकाम पैंतरा मात्र है। जिसने अपने कारनामों से अपनी प्रतिष्ठा को ही तार-तार कर दिया हो वह पत्रकारों को मानहानि का नोटिस कैसे भेज सकता है क्या साहब का काम मंदा चल रहा था इसलिए डरा धमकाकर 20 लख रुपए ऐंठने के फिराक में थे साहब यह तो एक सवाल है जिसका जवाब बखूबी तहसीलदार साहब ही दे सकते हैं।
जनता के ज्वलंत सवाल:
क्या 6 बार हुई अवैध रजिस्ट्री सिर्फ एक ‘इत्तेफाक’ हो सकती है?
कलेक्टर की अनुमति के बिना हस्ताक्षर करना पद का दुरुपयोग है या नहीं?
क्या प्रशासन इस मामले में उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच कराएगा या ’सद्विक त्रुटि’ के नाम पर फाइल बंद कर दी जाएगी?
निष्कर्ष:
लटोरी का यह जमीन घोटाला केवल एक तहसीलदार तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सिस्टम के भीतर बैठे उस सिंडिकेट का पर्दाफाश करता है जो सरकारी संपत्तियों को अपनी जागीर समझ बैठा है। अब देखना यह है कि जिला प्रशासन इस ‘बचाओ अभियान’ को रोकता है या भ्रष्टाचार की इस काली फसल को और फलने-फूलने देता है।

हमारे सूत्र ने बताया कि तहसीलदार साहब काफी ढीठ प्रवृत्ति के है और उन्हें अपने कर्म पर जरा सी भी शर्म नहीं है और ना ही उन्हें कोई फर्क पड़ता है उन्हें बस इस बात से फर्क पड़ता है कहीं से दो नंबर का कोई काम आए और उनका जेब भरता  रहे, हमारे सूत्र ने आगे एक मजाकिया अंदाज में बताया कि एक बॉलीवुड का गाना है लागा चुनरी में दाग छुपाऊं कैसे, लेकिन अब लोग अपने दामन पर लगे दाग छुपाने के लिए नोटिस भेजते हैं।

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