प्रशासनिक शुचिता पर सवाल: क्या केवल 3 प्रकरणों की जांच से मिल जाएगी क्लीन चिट?


SDM के खंडन में कई अनुत्तरित प्रश्न, दवा घोटाले और शेष 3 भू-प्रकरणों पर साधी चुप्पी
सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर लटोरी: सूरजपुर जिले के लटोरी तहसील अंतर्गत जमीनों की रजिस्ट्री और नामांतरण में हुई कथित अनियमितताओं का मामला अब तूल पकड़ता जा रहा है। हाल ही में स्थानीय प्रशासन (SDM) शिवानी जायसवाल द्वारा एक समाचार का खंडन करते हुए इसे ‘भ्रामक’ करार दिया गया है। हालांकि, इस खंडन ने समाधान देने के बजाय कई नए और गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आधा-अधूरा खंडन या बचाव की कोशिश?
सूत्रों और प्रकाशित खबरों के अनुसार, लटोरी क्षेत्र में जमीन के कुल 6 संदिग्ध प्रकरण सामने समाचारपत्र द्वारा लिए गए थे। हैरानी की बात यह है कि SDM महोदया द्वारा प्रस्तुत जांच रिपोर्ट में केवल 3 प्रकरणों का ही उल्लेख किया गया है। शेष 3 मामलों पर जांच न होना और उन पर चुप्पी साधे रखना, प्रशासन की कार्यप्रणाली पर संदेह पैदा करता है। यदि मंशा साफ है, तो सभी 6 प्रकरणों की विधिवत जांच क्यों नहीं की गई? क्या यह तहसील कार्यालय के अधिकारियों को बचाने की एक कवायद है?
दवा घोटाले के आरोपों पर भी मौन
समाचार में केवल जमीन ही नहीं, बल्कि डॉ. आयुष जायसवाल (SDM के पति) के नाम पर 90 लाख रुपये के कथित दवा घोटाले में संलिप्तता का भी उल्लेख किया गया था। SDM द्वारा जारी खंडन पत्र में इस गंभीर आरोप पर कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। जनता के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या केवल चुनिंदा तथ्यों का खंडन करना ही प्रशासनिक पारदर्शिता है?
कलेक्टर की अनुमति के बिना रजिस्ट्री का खेल
मामले की गंभीरता इस बात से भी बढ़ जाती है कि लटोरी तहसील के अंतर्गत कई ऐसी भूमियों की रजिस्ट्री और नामांतरण हुए हैं, जिनमें नियमानुसार कलेक्टर की अनुमति अनिवार्य होती है। बिना अनुमति के हुए इन कार्यों पर ‘कानून की मूर्ति’ की तरह आंखों पर पट्टी बांधे बैठना प्रशासनिक विफलता की ओर इशारा करता है।
समाचार की प्रामाणिकता और सूत्रों का हवाला
उल्लेखनीय है कि संबंधित समाचार पत्र ने किसी भी रिश्तेदारी की पुष्टि का दावा नहीं किया था, बल्कि स्पष्ट रूप से ‘सूत्रों से मिली जानकारी’ का उल्लेख किया था। ऐसे में SDM महोदया का केवल निराधार बातों को आधार बनाकर खंडन जारी करना और मुख्य मुद्दों (जैसे अधूरे जांच मामले और दवा घोटाला) से ध्यान भटकाना समझ से परे है।
मुख्य सवाल जिनका उत्तर जनता चाहती है:
6 प्रकरणों में से केवल 3 की ही जांच रिपोर्ट क्यों बनी?
बिना कलेक्टर की अनुमति के हुई रजिस्ट्रियों पर कार्रवाई कब होगी?
पति पर लगे दवा घोटाले के आरोपों पर चुप क्यों है?
क्या यह खंडन केवल अपनी छवि बचाने का एक औपचारिक प्रयास है?
इस पूरे मामले में अब देखना यह होगा कि जिला प्रशासन इन गंभीर अनियमितताओं पर संज्ञान लेकर किसी उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच के आदेश देता है या नहीं।

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