सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र लटोरी, सूरजपुर जिले के लटोरी तहसील में आने वाली प्रकरणों को देखकर के ऐसा लगता है कि यह तहसील केवल भू माफियाओं और खुद को स्वपोषित नेताओं के हाथ की कठपुतली मात्र बनकर रह गया है, शासकीय मत से प्राप्त भूमि की बिक्री हेतु कलेक्टर से परमिशन लेना अनिवार्य होता है लेकिन कुछ स्वपोषित नेता जो खुद को धारा की तरह बहाने वाले कभी बीजेपी तो कभी कांग्रेस कोई हारे तो उसके घर जाकर छाती पीठ पीठ का रोने वाले और कोई जीते तो उसके घर जाकर मिठाई खाने वाले ट्वीटपूंजिए जैसे लोग जो स्वयं को नेता कहते हैं, के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है। लटोरी तहसील में नियम और कानून तहसीलदार साहब के द्वारा ऐसे ताक रखे जाते हैं जैसे मानो वह खुद को प्रधानमंत्री की श्रेणी में रखते हो क्योंकि तहसीलदार के द्वारा कहीं शासकीय मत से प्राप्त भूमि के बिक्री हेतु चौहद्दी निर्माण किया जाता है वह भी बिना पटवारी प्रतिवेदन के तो कहीं बिना कलेक्टर की अनुमति के ऐसे भूमि की नामांतरण प्रक्रिया करके उसे अमली जामा पहनाया जाता है जिसका कलेक्टर अनुमति ही नहीं हुआ होता है,इस मामले में तो एक पटवारी ने भी तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा के कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े किए हैं जब उसके जमीन का नामांतरण बिना उसके जानकारी के तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने किया। तहसीलदार सुरेंद्र पर क्या सच में ईमानदार हैं अगर तहसीलदार साहब ईमानदार होते तो इतने बड़े-बड़े कारनामे उनके द्वारा नहीं किए जाते लेकिन वास्तविकता तो यह है कि वह स्वयं भी स्वीकारते हैं कि उनके द्वारा गलती हुई है एक विशेष सूत्र ने हमें बताया कि तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने त्रयंबक गुप्ता और उसके रिश्तेदार संजय गुप्ता से इस हस्ताक्षर के बदले₹100000 की मोटी रिश्वत ली थी। हालांकि यह केवल एक मामला नहीं है जिसमें तहसीलदार ने शासकीय मत से  प्राप्त भूमि के बिक्री हेतु नियमों को तक पर रखते हुए इस प्रकार से अपने पद और प्रतिष्ठा का दुरुपयोग करते हुए हस्ताक्षर किए हैं। हालांकि ऐसे लोग स्वयं को ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ बताते हैं लेकिन आप अगर उनके क्षेत्र में घूम लें तो लोग उनकी सच्चाई तुरंत बयां करने लगते हैं। आखिर जब तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने कागजों में पटवारी के हस्ताक्षर नहीं देखे थे तो उन्हें किस बात की जल्दबाजी थी या फिर वह पहली बार तहसीलदार बनकर लटोरी तहसील में आए थे और उनकी नियुक्ति भी तत्काल रही होगी जिस कारण हस्ताक्षर करने के जल्दबाजी में और खुद को तहसीलदार साबित करने की होड़ में बिना देखे ही की पटवारी ने अब तक इस संबंध में अपना प्रतिवेदन नहीं दिया है जानते हुए भी तहसीलदार वाली तलब मिटाने के चक्कर में पैकरा साहब कागजों पर हस्ताक्षर कर दिए।खैर मामला जो भी हो तहसीलदार साहब गलत किए हैं इस बात को उन्होंने स्वयं स्वीकारा भी है,पर ऐसा लगता है कि शासन प्रशासन सभी तक पैकरा साहब अपनी बात मनवाने का ताकत रखते हैं या फिर जो सूत्र बताते हैं रिश्वत की बात उसमें कुछ सम्मानजनक हिस्सा बड़े अधिकारियों का भी होता होगा। भाजपा और कांग्रेस दोनों के स्वपोषित नेता खुद को घोषित करने वाले ऐसे जमीन दलालों के चक्कर में आकर तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा ने स्वयं गलती की या फिर लालच वस ऐसा किया ये तो सुरेंद्र पैकरा ही बता सकते हैं। रजिस्ट्री होने के बाद त्र्यंबक प्रसाद गुप्ता शासकीय मत से प्राप्त भूमि पर बिना नामांतरण हुई ही मकान बना चुके हैं और सूत्र बताते हैं कि तहसीलदार साहब ने जब त्र्यंबक गुप्ता के साथ डील की है कि अपनी इस गलती या कारनामे को सही साबित करने के लिए सही वक्त का इंतजार करते हुए अपने ट्रांसफर से पूर्व इस जमीन का नामांतरण करने का वादा किया है।यह  देखने वाली बात होगा कि शासन के नियमों को तक पर रखते हुए क्या बिना परमिशन वाली इस भूमि का नामांतरण भी होगा या फिर तहसीलदार साहब अपनी गलती को सुधारते हुए कलेक्टर महोदय को इस रजिस्ट्री को खारिज करने हेतु आवेदन करेंगे, यदि तहसीलदार साहब इस रजिस्ट्री को खारिज करने के लिए कोई कदम उठाते हैं तो यह कहना गलत नहीं होगा कि उनसे भूल बस या गलती हुई है लेकिन यदि तहसीलदार सुरेंद्र पैकरा कोई कदम नहीं उठाते हैं तो यह कहना भी गलत नहीं होगा की उनकी मिली भगत या जो सूत्र बता रहे हैं रिश्वत की बात वह सच है।

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