सेमरसोत का जंगल गौ तस्करों की पहली पसंद बन चुका है,यहां से प्रत्येक रात भारी संख्या में गौ तस्करी धड़ल्ले से की जाती है,जिसपर यूं तो सबकी नजर पड़ती है लेकिन इसके खिलाफ आवाज उठाने वाला कोई नहीं है क्योंकि लोग इसे अपनी जिम्मेदारी नहीं बल्कि शासन की लापरवाही मानते हैं। अगर इनमें से कोई इन तस्करों की जानकारी पुलिस को देना भी चाहे तो पस्ता थाना प्रभारी विमलेश सिंह किसी का फोन उठाना भी जरूरी नहीं समझते।एक थाना प्रभारी होने के नाते विमलेश सिंह का यह कर्तव्य है वो इस प्रकार की संवेदनशील गतिविधियों पर नजर रखें लेकिन जब विमलेश सिंह लोगों के फोन ही नहीं उठाते तो फिर किसी घटना पर उनकी कितनी रुचि होगी या कितना नजर रखते होंगे यह समझ से परे नहीं है। सेमरसोत के जंगलों से रात के समय प्रति दिन बड़ी मात्रा में गाय और भैसों की तस्करी की जा रही है,जिसका अगर प्रत्यक्ष्य प्रमाण चाहिए तो आप सूर्यास्त के बाद जब अंधेरा हो तो स्वयं जाकर देख सकते हैं कि कैसे रात में कुछ दर्जन भर लोग अपना अपना काम बांट कर कैसे गौ तस्करी कर रहे हैं,इनमें से कुछ लोग जंगल में गायों को एकत्रित करते हैं जो टॉर्च भी साथ रखें रखते हैं और गुपचुप संदेश देने के लिए भी टॉर्च का उपयोग करते हैं।वहीं कुछ लोग पिकअप वाहन के साथ सेमरसोत जंगल से राजपुर बलरामपुर और प्रतापपुर के लिए प्रयुक्त तिराहे के पास भी निगरानी की भूमिका निभाते हैं और सही समय पर गायों को गाड़ियों में भर कर उनकी तस्करी करते हैं। यह पूरा खेल रोज चलने वाला हैं यह कोई विशेष नहीं हैं जो किसी खास दिन ही होता है,बल्कि यह रोज का तस्करों का धंधा और अड्डा है।ऐसे में विमलेश सिंह की स्थिति को भी संवेदनशील कहा जा सकता है क्योंकि जब यह आम आदमी के पहचान की बात है तो विमलेश सिंह को कैसे नहीं पता है इस बात पर यह भी सवाल उठता है कि क्या विमलेश सिंह थाना प्रभारी होने के लायक हैं…? क्या विमलेश सिंह इन तस्करों से गौ तश्करी पर रिश्वत लेकर अपना मुंह बंद करके रखें हैं..? क्या वो। विमलेश सिंह को इन गौ तस्करों से डर लगता है.? क्या इस तस्करी में विमलेश सिंह एक साझेदार व्यापारी की भूमिका निभा रहे हैं जिसमें उनका मुनाफा निहित हैं..?

तस्करों का का घर ही इस तस्करी के पैसे से चलता हैं और तो और उनकी रहिशी भी गौ तश्करी से ही हैं। इन गौ तस्करों के घर जो रोटी बनती हैं वो उन बेजुबानों के खून से आटा गूथा जाता हैं जिनकी तस्करी इन दलालों ने की है,इन घटिया तस्करों के घरों की सब्जी में ग्रेवी भी बेजुबानों के खून की ही होती हैं जिनकी तस्करी इन लोगों ने की होती हैं।

सिर्फ एक विमलेश सिंह जैसा थाना प्रभारी ही नहीं बल्कि सभी को गौ तश्करी पर संवेदनशील होना चाहिए पर कुछ थाना प्रभारी जो पूर्व में सामने आ चुके हैं इन तस्करों से महीना,या प्रति वाहन पर अपना निजी शुल्क लेकर उन्हें तश्करी करने का निजी आदेश भी देते हैं जिसके लिए प्रभारी एक सिपाही की ड्यूटी भी लगाते हैं जो इसकी वसूली और गाड़ियों को सकुशल पार कराने की जिम्मेदारी लेता है जिससे पूर्व में भी हम खबरों के माध्यम से जान चुके हैं। विमलेश सिंह को हमारे द्वारा इस संबंध में जानकारी देने के लिए कई बार फोन किया गया लेकिन उन्होंने ना फोन उठाया और ना ही फोन कर कोई जानकारी साझा की इसके बाद इस पूरे घटना को कंट्रोलरूप में सूचना दिए जाने के बाद दौरा चौकी को भी इसकी सूचना दी गई। विमलेश सिंह अगर सूचना देने वालों से इतना असहज महसूस करते हैं या उन्हें डर लगता हैं ऐसे लोगों से बात करने में तो फिर विमलेश सिंह गलत प्रोफेशन पर आ गए हैं खैर अब उम्र के हिसाब से विभाग तो नहीं बदल सकते हैं,तो फिर उन्हें अपने पद से त्यागपत्र दे देना चाहिए और गांव जाकर निर्भीक होकर कृषि करना चाहिए क्योंकि फिर उन्हें कोई किसी मामले की सूचना देने के लिए फोन नहीं करेगा।

बेजुबानों को कौन हैं जो रोज कटने से बचाएगा..?

बड़े बड़े तमगे वाले अधिकारी आए और गए लेकिन गौ तस्करी पर लगाम कोई नहीं लगा पा रहा है। सेमरसोत तो है ही खुद पुलिस विभाग से एक विश्वनीय सूत्र ने हमे बताया की वाड्रफनगर का एक ASI और एक आरक्षक खुद गौ तश्करी में संलिप्त हैं और रोज प्रति गाड़ी के हिसाब से पैसे लेकर अपनी मोटी कमाई को बढ़ा रहे हैं,यहां तक कि इनकी रिश्वतखोरी इतना अधिक है कि इन्हें अपना सैलरी तक छूने की जरूरत नहीं है केवल रिश्वत से इतना अनुचित लाभ कमा रहे हैं कि इन्हें वेतन के बारे में सुध लेने तक का समय नहीं हैं।

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