राजस्व रिकॉर्ड में खुला घोटाला, फिर भी चुप्पी!
5 बच्चों के पिता को ‘निःसंतान’ बताने वाले पटवारी पर आज तक कोई कार्रवाई नहीं

सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर लटोरी            क्या तहसील कार्यालय दे रहा है संरक्षण?
लटोरी | विशेष रिपोर्ट

भीख मांगने से सम्मान पर लगती है चोट इसी लिए शायद कुछ लोगों को रिश्वत लेना बहुत ही महान काम लगता है..?

क्या बिना रिश्वत लिए ऐसे अधिकारियों के घर के चूल्हा तक नहीं जलता है..?

आखिर जब सार्वजनिक है जानकारी तब भी चुप क्यों बैठे हैं तहसील के अधिकारी..?

क्या पटवारी से लेकर तहसीलदार तक सबका बंधा है हिस्सा..?

आखिर सब जानते हुए कार्यवाही करने से क्यों बच रहे हैं अधिकारी..?

क्या सभी मिली भगत से चल रहा है लटोरी तहसील में मनमानी का कानून..?

पहले सूत्र ने बताया था मोटी चमड़ी के हैं अधिकारी कर्मचारी इस लिए नहीं पड़ता कोई फर्क और करने हैं मनमानी..?

क्या गलत काम, विधि विरुद्ध, नियम विरुद्ध और रिश्वतखोरी करने वाले ही लाडले कहलाते हैं..?

ग्राम पंचायत लटोरी के खसरा क्रमांक 200, 205 और 217 से जुड़ा मामला अब केवल दस्तावेजी गड़बड़ी नहीं, बल्कि राजस्व विभाग की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल बन चुका है।
इन खसरों में भूमि स्वर्गीय कृपाराम और स्वर्गीय सोहन के नाम संयुक्त रूप से दर्ज थी।
दोनों के निधन के बाद जब वैधानिक वारिसों के नाम दर्ज करने की प्रक्रिया शुरू हुई, तभी से रिकॉर्ड में हेरफेर और नियमों की खुली अनदेखी की नींव रख दी गई।
बेटियों को बाहर कर दिया गया
स्व. कृपाराम के मामले में केवल दो पुत्रों के नाम दर्ज कर दिए गए, जबकि उनकी तीन जीवित बेटियाँ — रजमेत, देवती और देवकुमारी — को जानबूझकर राजस्व रिकॉर्ड से बाहर कर दिया गया।
यह न केवल उत्तराधिकार कानून का उल्लंघन है, बल्कि महिलाओं के अधिकारों पर सीधा हमला भी है।
सबसे गंभीर फर्जीवाड़ा: जिंदा परिवार को मिटा दिया
लेकिन इससे भी बड़ा और चौंकाने वाला फर्जीवाड़ा स्व. सोहन के मामले में सामने आया।
स्व. सोहन की
पत्नी भिन्सो,
पुत्र — बृजलाल और गुड्डू (विकास)
और पुत्रियाँ — कविता और मालती
आज भी जीवित हैं।
इसके बावजूद पटवारी संतोष भनिया द्वारा जारी किए गए इस्तेहार (नोटिस) में सोहन को ‘निःसंतान’ दर्शा दिया गया।
यह गलती नहीं, बल्कि जमीन से वैधानिक वारिसों को बेदखल करने की सुनियोजित साजिश मानी जा रही है।
कार्रवाई शून्य, सवाल अनगिनत
सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि
👉 इतना बड़ा फर्जीवाड़ा उजागर होने के बावजूद पटवारी के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की गई।
👉 न तो नोटिस निरस्त किया गया,
👉 न ही विभागीय जांच शुरू हुई।
इससे यह सवाल उठना लाज़िमी है कि
क्या पटवारी को तहसीलदार का संरक्षण प्राप्त है?
या फिर पूरा राजस्व तंत्र इस घोटाले को जानबूझकर नजरअंदाज कर रहा है?
विभाग क्यों नहीं ले रहा संज्ञान?
यह मामला अब केवल एक गांव या एक परिवार तक सीमित नहीं रहा।
यह सवाल खड़ा करता है कि—
क्या राजस्व विभाग के लिए कानून सिर्फ कागज़ी औपचारिकता बन गया है?
❓ क्या भ्रष्टाचार के मामलों में आंख मूंद लेना ही नई नीति है?
❓ क्या बिना राजनीतिक या प्रशासनिक संरक्षण के ऐसा फर्जीवाड़ा संभव है?
जनता में आक्रोश
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि जिंदा लोगों को ‘निःसंतान’ बताने पर भी कार्रवाई नहीं होती, तो आम नागरिक अपने अधिकारों की रक्षा के लिए किस दरवाज़े पर जाए?
अब निगाहें प्रशासन पर
अब देखना यह है कि
क्या राजस्व विभाग इस घोटाले का संज्ञान लेगा,
क्या पटवारी संतोष भनिया पर कार्रवाई होगी,
या फिर यह मामला भी फाइलों में दबाकर सिस्टम अपनी जिम्मेदारी से बच निकलेगा।

You missed