सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर लटोरी ग्राम पंचायत अंतर्गत खसरा नंबर 606 की भूमि, जो राजस्व रिकॉर्ड अनुसार बाजार (हाट) प्रयोजन के लिए आरक्षित बताई जा रही है, पर खुलेआम कब्जा कर पक्का निर्माण किया जा रहा है। हैरानी की बात यह है कि इस शासकीय भूमि पर न केवल निर्माण खड़ा कर दिया गया, बल्कि आज ढलाई का कार्य भी बेखौफ जारी रहा।

इस गंभीर मामले की सूचना एक दिन पहले पटवारी को कई बार फोन कर दी गई, लेकिन राजस्व विभाग के जिम्मेदार कर्मचारी ने फोन उठाना तक जरूरी नहीं समझा। यह लापरवाही नहीं, बल्कि अपने कर्तव्यों से स्पष्ट विमुखता मानी जा रही है, जिसके कारण अवैध निर्माण को रोकने का अवसर गंवा दिया गया,जब पटवारी से इस बारे में उनका बयान मांगा गया तो पटवारी ने बोला की कितने मामलों में बयान दूंगा शायद पटवारी को ही पता है कि उनके कारनामे इतने हैं कि उन्हें खुद नहीं पता क्यों कितने सारे मामले में बाइट दे पाएंगे,पटवारी के अड़ियल रेवईये को देख कर लगता है कि उनके द्वारा शायद पैसा खा कर इस प्रकार अवैध काम करवाया जा रहा है। पटवारी ने बताया कि उन्हें इस बात की जानकारी थी कि निर्माण हो रहा है लेकिन इस बात की नहीं की वह जमीन किसकी है। इतने लापरवाह बेपरवाह पटवारी के अंदाज से लगता है कि शायद तक उन्हें रिश्वत मिला होगा क्योंकि बढ़ती हुई महंगाई में घर चलना आसान नहीं है इस वजह से इस बेराम महंगाई ने शायद पटवारी को घूसखोरी करने पर मजबूर कर दिया होगा क्योंकि घर की जरुरते महंगाई के जैसी ही बढ़ती हैं और पटवारी इमानदारी से शायद इस बोझ को वहन नहीं कर पा रहे होंगे इसी लिए उन्हें ऐसे रिश्वत का सहारा लेकर बेशर्म बनना पड़ रहा होगा।

जानकारी देने के बाबजूद अगर काम नहीं रुकता है तो स्पष्ट है कि दाल में जरूर कुछ काला है

आज जब मामला राजस्व निरीक्षक (आरआई) डी.के. राठौर के संज्ञान में लाया गया, तो उन्होंने तहसीलदार को अवगत कराने की बात कही। इसके बाद जब पुनः पटवारी से संपर्क किया गया, तो उनका जवाब और भी चौंकाने वाला रहा। पटवारी ने स्वीकार किया कि उन्हें निर्माण की जानकारी थी, लेकिन यह नहीं पता था कि संबंधित भूमि निजी नहीं, बल्कि बाजार हेतु आरक्षित शासकीय भूमि है।

यह सवाल बेहद गंभीर है कि जिस भूमि का रिकॉर्ड देखना, उसकी प्रकृति पहचानना और अवैध निर्माण पर तत्काल रोक लगाना पटवारी की मूल जिम्मेदारी है, उसी भूमि को लेकर इस तरह की अनभिज्ञता कैसे संभव है। वहीं तहसील स्तर पर भी निगरानी और त्वरित कार्रवाई का अभाव साफ तौर पर नजर आ रहा है।

ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों का कहना है कि यदि समय रहते राजस्व अमला सक्रिय होता, तो ढलाई तक की नौबत ही नहीं आती। अब मांग उठ रही है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर अवैध निर्माण को तत्काल रोका जाए, शासकीय भूमि को कब्जामुक्त कराया जाए और साथ ही पटवारी एवं संबंधित अधिकारियों की भूमिका की जिम्मेदारी तय की जाए।

यदि इस मामले में ठोस कार्रवाई नहीं होती है, तो यह शासकीय भूमि पर कब्जे को मौन स्वीकृति देने जैसा माना जाएगा। फिलहाल पूरे क्षेत्र की नजरें तहसीलदार की कार्रवाई पर टिकी हुई हैं।

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