भ्रष्टाचार पर सवाल पूछने पर फील्ड ऑफिसर को होने लगी ‘प्रताड़ना’, क्या जवाबदेही से बचने का है यह नया पैंतरा? सिंधु स्वाभिमान समाचारपत्र सूरजपुर: जिले के रेशम विभाग के अंतर्गत आने वाले सिरसी, बैजनाथपुर और ऊंचडीह में सरकारी योजनाओं के नाम पर लूट का एक बड़ा खेल खेला जा रहा है। शासन की महत्वपूर्ण ‘मनरेगा’ योजना को किस तरह विभाग के जिम्मेदार अधिकारी पलीता लगा रहे हैं, इसकी जीती-जागती तस्वीर इन गांवों में देखी जा सकती है। पौधारोपण के नाम पर फर्जीवाड़ा नियमतः इन क्षेत्रों में नए पौधों का रोपण किया जाना था, जिसके लिए भारी-भरकम बजट स्वीकृत है। लेकिन धरातल पर एक भी नया पौधा नहीं रोपा गया। इसके उलट, विभाग के जादूगर अधिकारियों ने पुराने खड़े पेड़ों पर सफेद चूना पोत दिया और इसे ही ‘नया कार्य’ बताकर सरकारी खजाने में सेंध लगा दी। इतना ही नहीं, मस्टर रोल में उन मजदूरों के नाम और हाजिरी भी दर्ज कर दी गई जो कभी काम पर आए ही नहीं। यह सीधे तौर पर फर्जी मस्टर रोल तैयार कर जनता की कमाई हड़पने का मामला है। अधिकारी का अड़ियल रुख: ‘प्रताड़ना’ का ढोंग जब इस पूरे घोटाले के मुख्य किरदार और फील्ड ऑफिसर तिलक श्रीवास्तव से तथ्यों के साथ पक्ष मांगा गया, तो उनका व्यवहार बेहद गैर-जिम्मेदाराना रहा। अनुकंपा नियुक्ति के माध्यम से पद हासिल करने वाले श्रीवास्तव ने भ्रष्टाचार पर सफाई देने के बजाय पत्रकार को ही ‘प्रताड़ित’ करने का आरोपी बना दिया। सीधा कटाक्ष: “साहब, अनुकंपा पर नौकरी मिली है तो फर्ज और जिम्मेदारी भी विरासत में मिलनी चाहिए थी। जब आपकी कार्यशैली में कालिख लगी हो, तो सवालों की रोशनी आपको ‘प्रताड़ना’ ही लगेगी। जनता के पैसे की चोरी पर सवाल पूछना अगर प्रताड़ना है, तो लोकतंत्र का चौथा स्तंभ यह ‘प्रताड़ना’ बार-बार करेगा।” पत्रकारिता का धर्म बनाम भावनात्मक ब्लैकमेलिंग अक्सर देखा गया है कि जब घोटालेबाज अधिकारी चारों तरफ से घिर जाते हैं, तो वे ‘मानसिक तनाव’ या ‘आत्महत्या’ जैसे शब्दों का सहारा लेकर पत्रकारों को डराने की कोशिश करते हैं। यहाँ यह समझना आवश्यक है कि यदि समाचार प्रकाशन के बाद कोई अधिकारी दबाव में आकर गलत कदम उठाता है, तो वह उसकी अपनी कार्यप्रणाली और भ्रष्टाचार का परिणाम होगा। एक सजग पत्रकार का काम आईना दिखाना है। यदि आईने में अक्स गंदा दिख रहा है, तो दोष आईने का नहीं, बल्कि चेहरे पर लगी उस कालिख का है जिसे अधिकारी ने खुद पोता है। सच्चाई उजागर करना पत्रकार का संवैधानिक अधिकार और कर्तव्य है, इसे ‘प्रताड़ना’ का नाम देकर दबाया नहीं जा सकता। प्रशासनिक मौन पर सवाल यह देखना दिलचस्प होगा कि सूरजपुर जिला प्रशासन और रेशम विभाग के उच्च अधिकारी इस खुले भ्रष्टाचार और फील्ड ऑफिसर के अड़ियल रवैये पर क्या संज्ञान लेते हैं। क्या चूना पोतने वाले इन ‘जादूगरों’ पर कार्रवाई होगी या सरकारी धन ऐसे ही सफेद चूने की भेंट चढ़ता रहेगा? आखिर एक चतुर्थ वर्ग कर्मचारी कैसे साहब बन बैठा है इसका जवाब तिलक श्रीवास्तव और रेशम विभाग ही सही से दे पाएंगे। Post navigation सिंधु स्वाभिमान एक्सक्लूसिव: जुआ फड़ मामले में पुलिस पर तो गिरी गाज, लेकिन ‘रसूखदार’ जुआरी अब भी रडार से बाहर! भ्रष्टाचार की कलई खुली तो ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगे जिम्मेदार: जांच के नाम पर सिर्फ चुप्पी