भ्रष्टाचार की ‘रेशमी’ चादर में छिपे असली खिलाड़ी कौन? क्या तिलक श्रीवास्तव सिर्फ एक मोहरा है?

सिंधु स्वाभिमान विशेष : सूरजपुर के रेशम विभाग में पुराने पेड़ों पर चूना पोतकर नई पौध दिखाने का ‘जादुई खेल’ अब केवल एक फील्ड ऑफिसर तक सीमित नहीं लगता। दो बार समाचार प्रकाशित होने और साक्ष्यों के सार्वजनिक होने के बावजूद प्रशासन की रहस्यमयी चुप्पी कई गंभीर सवाल खड़े कर रही है। क्या यह चुप्पी किसी बड़े संरक्षण का इशारा है?
मोहरा श्रीवास्तव या मास्टरमाइंड कोई और?
भ्रष्टाचार के इस खेल में फील्ड ऑफिसर तिलक श्रीवास्तव की भूमिका संदिग्ध तो है ही, लेकिन सवाल यह है कि क्या एक मैदानी कर्मचारी की इतनी हैसियत है कि वह अकेले पूरे विभाग की आंखों में धूल झोंक दे?
नियमतः, किसी भी कार्य का भौतिक सत्यापन  उच्च अधिकारियों द्वारा किया जाता है। मस्टर रोल पर हस्ताक्षर और बजट की निकासी बिना वरिष्ठों की सहमति के संभव नहीं है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि क्या तिलक श्रीवास्तव केवल एक ‘फ्रंट मैन’ है, जो ऊपर बैठे ‘बड़े खिलाड़ियों’ के लिए अवैध वसूली का जरिया बना हुआ है? क्या असली खिलाड़ी पर्दे के पीछे बैठकर कागजों को सफेद कर रहे हैं और तिलक को ‘प्रताड़ना’ का ढोंग करने की ट्रेनिंग दे रहे हैं?
मोटी चमड़ी’ और प्रताड़ना का दोहरा मापदंड
हैरानी की बात यह है कि जब भ्रष्टाचार की खबरें प्रमाणों के साथ छपीं, तब तिलक श्रीवास्तव की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ा। दो-दो बड़ी खबरें आने के बावजूद काम करने का अंदाज नहीं बदला, लेकिन जैसे ही पत्रकार ने फोन कर आधिकारिक पक्ष मांगा, तो तिलक श्रीवास्तव अचानक ‘प्रताड़ित’ होने लगे।
यह कैसा विरोधाभास है? सरकारी खजाने की लूट पर सवाल पूछना ‘प्रताड़ना’ कैसे हो गया? दरअसल, यह उन भ्रष्ट अधिकारियों का पुराना पैंतरा है जो तथ्यों का सामना नहीं कर पाते, तो ‘इमोशनल कार्ड’ खेलकर जवाबदेही से बचना चाहते हैं। जो व्यक्ति दो समाचारों के बाद भी टस से मस न हुआ हो, वह सवालों से प्रताड़ित होने का दावा करे, तो समझ जाइए कि दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है।
प्रशासनिक मौन: संरक्षण या लापरवाही?
सूरजपुर जिला प्रशासन और रेशम विभाग के आला अधिकारियों की भूमिका भी अब जांच के दायरे में है।
क्या उच्च अधिकारियों को इन गांवों (सिरसी, बैजनाथपुर, ऊंचडीह) की जमीनी हकीकत नहीं पता?
क्या ‘मनरेगा’ जैसी योजनाओं में हो रही इस खुली लूट पर कार्रवाई न करना भ्रष्टाचार को मौन सहमति देना नहीं है?
आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि स्पष्ट प्रमाणों के बाद भी अब तक जांच कमेटी गठित नहीं की गई?
निष्कर्ष: आईना साफ़ है, नीयत खराब है
पत्रकारिता का काम सच को बेनकाब करना है। तिलक श्रीवास्तव को यह समझना होगा कि उनके द्वारा प्रयुक्त ‘प्रताड़ना’ शब्द पत्रकार की कर्तव्यनिष्ठा को कमजोर नहीं कर सकता। यदि वे पाक-साफ हैं, तो जांच से डर कैसा? और यदि दोषी हैं, तो कार्रवाई से बचने के लिए ‘भावनात्मक ब्लैकमेलिंग’ का रास्ता उन्हें कानून के शिकंजे से नहीं बचा पाएगा।
अब गेंद सूरजपुर कलेक्टर और विभाग के बड़े साहबों के पाले में है। क्या वे इस सफेद चूना कांड के मास्टरमाइंड तक पहुंचेंगे, या फिर इस फाइल को भी ‘प्रताड़ना’ के नाम पर ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
जारी रहेगा…


सवाल:क्या तिलक श्रीवास्तव के पीछे किसी रसूखदार अधिकारी का हाथ है?
कटाक्ष:चूना पेड़ों पर लगा है या विभाग की साख पर?
चुनौती: अगर प्रताड़ना हुई है, तो श्रीवास्तव बताएं कि जनता के पैसे का हिसाब देना प्रताड़ना कैसे है?

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